मुंबई, 20 फरवरी (वार्ता) अभिनेता ताहा शाह बदुशा का कहना है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) सिनेमा को आकार दे सकता है, लेकिन मानवीय भावनाओं को नहीं दे सकता है। ताहा शाह बदुशा के अनुसार तकनीक सिनेमा को बेहतर बना सकती है, लेकिन वह उस भावनात्मक सच्चाई की जगह नहीं ले सकती, जो सिर्फ़ एक इंसान परदे पर ला सकता है।इस संदर्भ में उन्होंने कहा, “जब कोई भावनात्मक सीन होता है, फिर वो चाहे माँ के साथ हो, पत्नी के साथ हो या बच्चे के साथ हो, तो वह भावना हमें खुद महसूस करनी होती है। इस जुड़ाव या भावना को हम चाहकर भी मशीन से पैदा नहीं कर सकते।” ताहा ने कहा, “कभी एडिट में हल्की सी जंप दिख जाती है, कभी लिप-सिंक थोड़ा सा अटपटा लगता है, या कोई इमोशनल बीट पूरी तरह असर नहीं छोड़ पाती। मुझे यक़ीन है कि आने वाले समय में ये तकनीकी कमियाँ भी दूर हो जाएँगी, लेकिन अभिनेता और दर्शक के बीच का भावनात्मक रिश्ता कहीं ज़्यादा गहरा होता है।
दर्शकों का जुड़ाव परफ़ेक्शन से नहीं, बल्कि सच्चाई से होता है। लोग किसी इमेज से नहीं, एक इंसान से जुड़ते हैं। वे उसकी कमज़ोरियों से, उसकी ख़ामोशी से, उन ठहरावों से जुड़ते हैं, जो प्रोग्राम नहीं किए गए होते। उन्हीं ख़ामोशियों में असली क्रिएटिविटी बसती है।” ताहा यह भी मानते हैं कि एआई फ़िल्ममेकिंग के कई तकनीकी पहलुओं को संभालेगा। हाँ, जो लोग सीखने और बदलने से इनकार करेंगे, उन्हें मुश्किल हो सकती है, लेकिन जो अभिनेता और क्रिएटर्स एआई को समझकर उसे अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करेंगे, उनके लिए संभावनाएँ और बढ़ेंगी। इसके अलावा सीमित बजट वाले फ़िल्ममेकर्स के लिए भी एआई ने नए दरवाज़े खोले हैं, जिससे वे अपनी सोच को ज़्यादा आज़ादी के साथ साकार कर सकें। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि तकनीक चाहे कितनी भी प्रगतिशील हो, लेकिन भावनात्मक गहराई की जगह नहीं ले सकती।

