ग्वालियर: पुरातात्विक विज्ञान में प्रगति के माध्यम से, रेडियोकार्बन डेटिंग जैसी वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करके पुरातात्विक सामग्रियों का विश्लेषण किया जा रहा है, जिससे प्राचीन संस्कृतियों के समय का अधिक सटीक निर्धारण किया जा सके। यह बात बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. एमपी अहिरवार ने कही। वे जीवाजी विश्वविद्यालय के गालव सभागार में आयोजित ‘मध्य प्रदेश के विशेष संदर्भ में पुरातत्व पर नए रुझान’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलगुरू प्रो.राजकुमार आचार्य ने की। इस मौके पर कुलसचिव प्रो.राकेश कुशवाह और आयोजन सचिव डॉ.शांतिदेव सिसोदिया मंचासीन रहे। कुलगुरू प्रो.आचार्य ने कहा कि बदलते समय के साथ हमें नई तकनीक को अपनाना होगा।पुरातत्व पर नए रुझान मध्य प्रदेश को पुरातात्विक शोध के एक जीवंत केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं, जो अतीत की आकर्षक कहानियों को उजागर करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम शोध की ओर अग्रसर करते हैं और शोधार्थियों को चिंतन का अवसर मिलता है।
कुलसचिव प्रो. राकेश कुशवाह ने कहा कि मध्य प्रदेश में भीमबेटका के शैलचित्रों, सांची के स्तूपों और खजुराहो के मंदिरों जैसे ऐतिहासिक स्थलों के अलावा नई खोजें, राज्य की प्राचीन सभ्यताओं की समझ को और अधिक समृद्ध कर रही हैं। कार्यक्रम के दौरान तीन तकनीकी सत्र आयोजित किए गए जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से आए शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
इसी क्रम में सभी अतिथियों को शाल श्रीफल व स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। प्रो.शांतिदेव सिसोदिया के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इस अवसर पर प्रो. एमपी सिंह, डॉ. राजकुमार आचार्य, प्रो. राकेश कुशवाह, प्रो. शांतिदेव सिसौदिया, डॉ. सतेंद्र सिकरवार, डॉ.कृतिका प्रधान, डॉ. अमिता सिंह, डॉ.अर्चना द्विवेदी, डॉ.अभिलाषा चौधरी सहित शोधार्थी व छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।
