नई दिल्ली, 17 जुलाई (वार्ता) अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत-चीन संबंधों में आए नए बदलाव को अलग-थलग करके नहीं, बल्कि दुनिया में कई राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के कदम के रूप में देखना चाहिए।
एशिया की इन दोनों बड़ी ताकतों के रिश्तों में दोबारा संतुलन बनाने की कवायद विदेश मंत्री एस. जयशंकर की शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक के लिए हाल ही की बीजिंग यात्रा में साफ तौर पर दिखती है। गौरतलब है कि साल 2020 की गलवान घटना के बाद जयशंकर की यह पहली चीन यात्रा थी। यह दोनों देशों में चले आ रहे तनाव के बाद आपसी संबंधों में नए सिरे से जुड़ाव को दर्शाती है।
डॉ. जयशंकर की चीन यात्रा का मकसद अगस्त- सितंबर में होने वाले एससीओ शिखर सम्मेलन के लिए भारत के एजेंडे को अंतिम रूप देना था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन जाने की उम्मीद है। गलवान घाटी में हुई फौजी झड़पों के बाद यह उनकी पहली चीन यात्रा होगी।
ये उच्च-स्तरीय कूटनीतिक कदम रूस के कज़ान में 2024 ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान श्री मोदी की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक के दौरान तनाव कम करने के रोडमैप की ओर इशारा करते हैं।
जॉर्डन, लीबिया और माल्टा में राजदूत रह चुके अनिल त्रिगुणायत के अनुसार, “डॉ. जयशंकर की यात्रा महत्त्वपूर्ण है। यह यात्रा, कज़ान बैठक के बाद द्विपक्षीय संबंधों को तेजी देने वाली है। रक्षा मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की चीन की हालिया यात्राएँ, दोनों देशों के नए रोडमैप को दर्शाती हैं। इसमें एससीओ एक समानांतर राजनयिक मंच प्रदान करता है।
यह द्विपक्षीय वार्ता सीमा तनाव से परे वैश्विक रणनीतिक बदलावों खासकर चीन के दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ एलीमेंट) को लेकर चल रही सियासत की पृष्ठभूमि में हो रही है। जब से चीन ने इन तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए तब से दुनिया भर में इसे लेकर चिंता पैदा हो गई है। भारत अपनी मेक इन इंडिया पहल को आक्रामक रूप से आगे बढ़ा रहा है। इसके लिए दुर्लभ मृदा तत्व न केवल इलेक्ट्रिक वाहनों और स्मार्टफ़ोन के लिए, बल्कि आकाश और अस्त्र मिसाइल प्रणालियों जैसे सैन्य उपकरणों के लिए भी आवश्यक है।
श्री त्रिगुणायत ने कहा कि चीन वीज़ा सुविधा और सीधी उड़ानों के लिए उत्सुक है, जबकि भारत दुर्लभ मृदा की आपूर्ति पर लगे प्रतिबंधों को हटाना चाहेगा। डॉ. जयशंकर ने सामान्य स्थिति बहाल करने में “अच्छी प्रगति” पर ज़ोर दिया और इस बदलाव का श्रेय वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव के समाधान को दिया। फिर भी, एक नजरिए से दोनों देशों के आपसी विश्वास की डोर नाजुक ही बनी हुई है।
चीन के वैश्विक मामलों के जानकार और फोर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीति के प्रोफेसर फैसल अहमद ने दोनों देशों के बीच निरंतर बढ़ रहे संवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत और चीन के बीच मतभेदों की तुलना में साथ चलने के कई पहलू हैं। चाहे व्यापार, रणनीतिक सहयोग हो या सांस्कृतिक, दोनों देशों ने द्विपक्षीय वार्ता कभी बंद नहीं की। उन्होंने कैसे भी करके इसे बनाए रखा है। इसके लिए कभी-कभी ट्रैक टू डिप्लोमेसी जैसे वैकल्पिक तरीकों को भी आजमाया गया है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली और सीधा हवाई संपर्क के प्रयासों को बढ़ते सहयोग का संकेत बताते हुए श्री अहमद ने कहा कि यह न भूलें कि दोनों नेताओं, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2018 और 2019 में अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के माध्यम से सीधी बातचीत भी की है।
उन्होंने इस धारणा को खारिज कर दिया कि रिश्ते में आई गरमाहट की वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए टैरिफ हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं लगता कि श्री ट्रंप का आयात शुल्क का दबाव, भारत और चीन को करीब ला रहा है। चीन, इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ सख्ती से पेश आ रहा है और भारत भी इस विचार के आधार पर बातचीत कर रहा है कि व्यापार समझौते से दोनों पक्षों को लाभ होना चाहिए, न कि अमेरिका को एकतरफ़ा फ़ायदा।
इसके बाद भी कुछ चिंताएँ बनी हुई हैं। दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर जैसे क्षेत्रीय विवाद दोनों देशों के रणनीतिक दृष्टिकोण के केंद्र में बने हुए हैं। भारत चाहता है कि चीन पाकिस्तान के आतंकवाद पर, खासकर क्षेत्रीय उग्रवाद से निपटने के एससीओ के घोषित मिशन के तहत ठोस कदम उठाए।
