
ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
फवाद अहमद बरसों पहले कह गये हैं कि “रूठे लोगों को मनाने में मज़ा आता है।” लगता है कि कांग्रेस के सूबा सदर उनकी इसी तज़बीज पर अमलो दरफ्त फरमा रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में अपनी धर्मपत्नी के लिए टिकट मांग रहे कांग्रेस के पुराने नेता राजेंद्र सिंह तोमर के घर पर जीतू पटवारी की आमद से तो यही अंदाज लगाया जा रहा है। कहते हैं कि तमाम तैयारी कर लेने के बाद भी टिकट की मुराद पूरी न होने पर राजेंद्र तोमर नाराज हो गए थे और उन्होंने टिकट से वंचित दीगर नेताओं सौरभ, वीरेन्द्र और अशोक तोमर के साथ मिलकर साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस के टिकट पर तल्ख तेवर जाहिर किए थे। बहरहाल राजेन्द्र तोमर के घर जाना उन कांग्रेसियों को खटक गया जिन्होंने 23 के चुनाव में यहां कांग्रेस प्रत्याशी को जिताने जी जान लगा दी थी। दरअसल, राहुल गांधी के इंदौर में हो रहे छात्रों की गूंज कार्यक्रम की तैयारी के लिए राजेंद्र तोमर के घर पर इस हफ्ते एक बैठक में जीतू का जाना हुआ था। शिकवा करने वालों को राजेंद्र तोमर के पैरोकारों ने जवाब दिया है कि मधुवन वालों ने कभी कांग्रेस से वफादारी नहीं तोड़ी और आज भी कांग्रेसी हैं। जीतू के हमकदम रहने वाले भी कह रहे हैं कि मिशन 28 को कामयाब करने पीसीसी सदर पार्टी से जुड़ी रही हर चौखट पर दस्तक दे रहे हैं तो इसमें हर्ज क्या है…!
*पार्षदी का सुख भोगने की आस भई निराश*
लगता है कि ग्वालियर शहर का वार्ड पांच बिना पार्षद के ही रहेगा, वजह यह कि यहां 29 सितंबर को होने वाला उपचुनाव टाल दिया गया है जबकि तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक यहां आज से पर्चे भरने का काम शुरू होना था। कांग्रेस यहां सहानुभूति वोटों का फायदा लेने मरहूम पार्षद पीपी शर्मा के बेटे आशीष को चुनाव लड़ाने की तैयारी किए थी जबकि भाजपा ने प्रत्याशी चयन की जिम्मेदारी अभय चौधरी और विनय जैन के सुपुर्द की थी। चुनाव सिर्फ एक वार्ड में होना था लेकिन चुनावी माहौल मुकम्मल उपनगर में बन गया था। इससे पहले कि पर्चे भरने का काम शुरू होता, भोपाल से चुनाव मुल्तबी करने का फरमान आ गया। ग्वालियर पहुंचे हुक्मनामे में वजह तो साफ नहीं की गई लेकिन इसे शहर में बारिश और जलभराव जैसी समस्याओं से जोड़कर देखा जा रहा है। मौजूदा निगम परिषद का कार्यकाल खत्म होने में चंद महीने बचे हैं, लिहाजा अब यहां उपचुनाव की ज्यादा गुंजाइश नहीं दिखती। हम तो यही कहेंगे कि जिन पदाभिलाषियों का तमाम तैयारी के बावजूद पार्षद बनने का सपना टूटा है, उन्हें गोपालदास नीरज की इस सलाह पर भरोसा करना चाहिए “कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।”
*शहर की तीन बड़ी संस्थाएं चुनने जा रहीं नया निजाम, माहौल चुनावी*
उपनगर ग्वालियर में निगम उपचुनाव का शोरगुल भले ही थम गया है लेकिन इस महीने के आखिर और अगले महीने शहर में हजारों सदस्यों की तादात वाली तीन बड़ी संस्थाओं के होने जा रहे चुनावों के लिए गहमागहमी जारी है। इन तीनों संस्थाओं का मिजाज अलग अलग है। एक व्यापारियों की संस्था है, दूसरी सामाजिक और तीसरी विशुद्ध धार्मिक। हम जिकर कर रहे हैं दाल बाजार व्यापार समिति, मप्र सनाढ्य महासभा और अचलेश्वर ट्रस्ट के चुनावों की। हालांकि सियासतदानों का इन चुनावों से खास लेना देना नहीं है लेकिन दो महीने पहले हुए चेंबर चुनाव की तरह इन गैरराजनीतिक संस्थाओं में भी सियासतदान अपने पट्ठे बिठाने की जुगत में हैं। चेंबर चुनाव की ही तर्ज पर दाल बाजार व्यापार समिति के चुनाव 24 को होने जा रहे हैं जिसमें शहर की सबसे बड़ी गल्ला मंडी के 756 व्यापारी वोट डालेंगे। वर्तमान अध्यक्ष दिलीप पंजवानी व सचिव विवेक जैन दोबारा चुनाव लड़ने की ताल ठोंक चुके हैं। इसी तरह सनाढय ब्राह्मणों की सबसे बड़ी संस्था मप्र सनाढय ब्राह्मण महासभा के प्रांताध्यक्ष पद के लिए भी 20 सितम्बर को चुनाव होना है। इस चुनाव में पत्रकारिता और समाजसेवा के क्षेत्र के चेहरे डॉ. केशव पाण्डेय सहित महेंद्र शर्मा और पत्रकार राजेश अवस्थी लावा मैदान में हैं। करीब तीन हजार से ज्यादा मेंबरों वाली इस संस्था का मुखिया बनने करीब 35 दावेदारों ने अब तक पर्चे भरे हैं। शहर के सबसे बड़े मंदिर अचलेश्वर महादेव के ट्रस्ट के चुनाव भी करीब एक दशक के लंबे इंतजार के बाद कोर्ट के निर्देश पर 11 अक्टूबर को होने जा रहे हैं। यहां भी हजारों सदस्यों की तादात है। कोर्ट ने विवादों में घिरे पूर्व ओहदेदारों के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी है। बहरहाल, शहर में माहौल हर तरफ चुनावी है।
*दस्यु समस्या खत्म लेकिन स्पेशल कानून कायम !*
कुछ दशक पहले तक समूचा ग्वालियर चंबल इलाका दस्यु समस्या से ग्रसित था। लिहाजा 45 साल पहले इस दस्यु प्रभावित क्षेत्र के लिए विशेष कानून बनाया गया था। सरकार ही दस्यु समस्या खत्म होने का दावा करती रही है लेकिन कानून अब तक अमल में है। जाहिर है कि कानून का दुरूपयोग हो रहा है। गृह मंत्री रह चुके डॉ. गोविन्द सिंह इसी मसले को कोर्ट में ले गए हैं। कोर्ट ने बड़े हाकिमों को नोटिस भी जारी कर दिए हैं। उम्मीद लगाई जा रही है कि चंबल को इस स्पेशल कानून से निजात मिल सकती है…!
