
बंडा से लौट कर अवनीश जैन की रिपोर्ट सागर। बमूरा भेड़ा में सड़क किनारे बसे घरों में इन दिनों चूल्हे तो जल रहे हैं, लेकिन कई परिवारों के घरों में जिंदगी जैसे थम गई है। कहीं जवान बेटे की मौत के बाद बुजुर्ग पिता की आंखें पथरा गई हैं, कहीं पिता और बेटे दोनों की मौत ने परिवार की कमर तोड़ दी है और कहीं बच्चे अपने पिता के शव के लौटने का इंतजार करते हुए रो रहे हैं। दो दिन पहले तक जिन घरों में रोजमर्रा की जिंदगी थी, वहां अब मातम है। वजह बनी जहरीली-अवैध शराब।
केस-1 : पिता गया, बेटा भी चला गया
गोविंद सिंह और उनके बेटे रामप्रसाद लोधी की मौत इस त्रासदी की सबसे दर्दनाक तस्वीर है। एक ही परिवार में पिता और पुत्र की मौत के बाद घर में मातम पसरा है। परिवार का एक और बेटा भूरा अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है। यानी शराब ने एक ही परिवार से दो जिंदगियां छीन लीं और तीसरे को अस्पताल पहुंचा दिया।
केस-2 : काम की तलाश में आया था, शव लेकर लौटना पड़ा
सुरेंद्र अहिरवार मूल रूप से लिधौरा हाट का रहने वाला था। मकान निर्माण में मिस्त्री का काम मिलने के कारण उसका बमूरा आना-जाना था। इसी दौरान वह भी जहरीली शराब की चपेट में आ गया। जिस गांव में वह रोजी-रोटी कमाने आया था, वहीं से उसकी जिंदगी का सफर खत्म हो गया।
केस-3 : शराबबंदी वाले गांव की अलग कहानी
बमूरा भेड़ा से कुछ दूरी पर हनौता पटकुई गांव है। यहां ग्रामीणों ने कुछ वर्षों से शराब के बिक्री और सेवन पर सामूहिक रोक लगा रखी है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव वालों की एकजुटता के कारण शराब का कारोबार यहां पैर नहीं जमा सका। एक ही इलाके के दो गांवों की यह तस्वीर बड़ा सवाल खड़ा करती है, जहां समाज ने रोक लगाई, वहां हालात अलग हैं और जहां अवैध कारोबार चलता रहा, वहां कई घरों में मातम है।
केस-4 : चेतावनी पहले दी थी, कार्रवाई बाद में भी नहीं हुई
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस त्रासदी को रोका जा सकता था? पिछले साल बण्डा जनपद क्षेत्र की करीब दो दर्जन पंचायतों के सरपंचों और ग्रामीणों ने अवैध शराब की बिक्री रोकने के लिए जिला प्रशासन को पत्र दिया था। ग्रामीणों ने गांव-गांव अवैध शराब बिकने की शिकायत की थी। इसके बावजूद समस्या बनी रही। अब मौतों के बाद वही शिकायतें सवाल बनकर सामने खड़ी हैं।
केस-5 : छापरी में मौतों के बाद भी कारोबार जारी
बण्डा क्षेत्र के छापरी गांव की कहानी भी कम दर्दनाक नहीं है। यहां जहरीली-अवैध शराब से चार लोगों की मौत का उल्लेख है। कुलदीप दांगी, कैलाश अहिरवार, श्यामबाई और अरविंद विश्वकर्मा इस त्रासदी के शिकार हुए। इसके बावजूद ग्रामीणों के मुताबिक गांव में अवैध शराब की बिक्री पूरी तरह नहीं रुकी है। मेडिकल कॉलेज में गांव के कई मरीजों के भर्ती होने की बात सामने आ रही है। इस तरह
बमूरा भेड़ा और छापरी की गलियों में अब सिर्फ मौतों की गिनती नहीं हो रही। हर घर अपनी कहानी सुना रहा है
किसी ने बेटा खोया, किसी ने पिता, किसी ने कमाने वाला सदस्य। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन गांवों के लोगों ने पहले ही अवैध शराब के खिलाफ आवाज उठाई थी, उनकी आवाज समय रहते क्यों नहीं सुनी गई? क्योंकि अब प्रशासन के सामने सिर्फ अवैध शराब का मामला नहीं, बल्कि उन परिवारों का दर्द है जिनके घरों में लौटकर उनके अपने कभी नहीं आएंगे।
