
दिल्ली डायरी
प्रवेश कुमार मिश्र
देश की राजनीति में इन दिनों शुद्धिकरण जैसा बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दा बहस का विषय बन गया है. जिसके कारण जातिगत चेतना और राजनीति के टकराव को एक बार फिर सामने ला दिया. उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की एक रैली हुई थी, जिसके बाद वहां के रामलीला मैदान में गंगाजल छिड़ककर और हवन करके ‘शुद्धिकरण’ किया गया. इस एक घटना ने पूरे देश की सियासत में भूचाल ला दिया है . कांग्रेस ने इसे बेहद आक्रामक ढंग से उठाया है. राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे समेत पूरी पार्टी का आरोप है कि यह सीधे तौर पर दलित समाज और देश के एक बड़े नेता का जातिगत अपमान है. उन्होंने इसे छुआछूत की मानसिकता का प्रतीक बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है. जबकि भाजपा और इस अनुष्ठान को करने वाले संगठन श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास का तर्क बिल्कुल अलग है. उनका कहना है कि रैली के बाद मैदान में भारी गंदगी और शराब की खाली बोतलें मिली थीं, जिससे उस पवित्र धार्मिक स्थल की मर्यादा भंग हुई थी. उनके अनुसार, यह केवल एक सामान्य सफाई और धार्मिक शुद्धि का अनुष्ठान था. लेकिन कांग्रेस इसे जबरन जातिगत रंग देकर राजनीति कर रही है. विवाद यहीं नहीं थमा, बल्कि अब यह कानूनी लड़ाई में बदल चुका है. इस मामले को सामाजिक रूप से भड़काने के आरोप में राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हो गई है. इसके कारण उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है. ऐसे में दोनों ही दल इस मुद्दे के सहारे दलित मतदाताओं को अपने पाले में करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.
काकरोच जनता पार्टी के दबाव में झूकी सरकार
भारतीय लोकतंत्र में युवाओं की बदलती ताकत भांपकर केंद्र सरकार के रणनीतिकारों ने सीजेपी के तीखे तेवरों के आगे समझौतावादी तेवर अपनाकर केंद्र सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाए हैं. जिसके बाद सीजेपी ने 5 सितंबर को नई दिल्ली में प्रस्तावित विरोध मार्च वापस लेने का फैसला किया है. दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मोदी सरकार भी झुकती है. क्योंकि परीक्षा धांधली और पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर से शुरू हुआ युवाओं का यह आक्रोश इतना बड़ा दबाव समूह बन जाएगा, इसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी. इस अनोखे संगठन के राष्ट्रव्यापी आंदोलन और चौतरफा दबाव के आगे बेबस होकर सरकार को पहले बैकफुट पर आकर तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और अब सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल करना पड़ा है.
बुलेट ट्रेन की रफ्तार बनाम आम जनता
उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से ही बड़े वादों और विकास के मेगा प्रोजेक्ट्स के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र जो नई पटकथा लिखी जा रही है, वह रफ्तार की एक नई परिभाषा गढ़ने वाली है. सरकार ने इस बार केवल एक्सप्रेसवे और हवाई अड्डों तक सीमित न रहकर सीधे बुलेट ट्रेन को चुनावी बिसात पर उतारने की पूरी तैयारी कर ली है. रेल मंत्रालय द्वारा हाल ही में देश के अगले बड़े हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की घोषणा ने राज्य के सियासी माहौल में एक नई चर्चा छेड़ दी है. दिल्ली से आगरा, कानपुर, लखनऊ, प्रयागराज और वाराणसी को जोड़ने वाला यह प्रस्तावित 813 किलोमीटर लंबा बुलेट ट्रेन कॉरिडोर अब केवल एक तकनीकी प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि यूपी चुनाव का एक बेहद चमकीला और बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है. इस मेगा प्रोजेक्ट के जरिए जनता को यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि दिल्ली से लखनऊ का सफर महज सवा दो घंटे और वाराणसी तक की दूरी साढ़े तीन घंटे में सिमट जाएगी. सरकार इस विकास मॉडल को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि और भविष्य के विजन के रूप में पेश करने की रणनीति बना चुकी है, ताकि कानून-व्यवस्था और एक्सप्रेसवे के पुराने दावों के साथ इस अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की चमक को भी जोड़ा जा सके. दूसरी तरफ विपक्षी खेमा इसे जमीनी हकीकत से दूर और केवल एक चुनावी शिगूफा बता रहा है. विपक्ष का तर्क है कि जहां अभी आम रेल व्यवस्था, बेरोजगारी और बुनियादी सुविधाएं पटरी पर नहीं आ पाई हैं, वहां बुलेट ट्रेन के ऊंचे किराए और भारी-भरकम बजट की बात करना सिर्फ ध्यान भटकाने की कोशिश है. ऐसे में कहा जा रहा है कि जमीनी मुद्दों और दावों की इस खींचतान के बीच यह तो साफ है कि यूपी की चुनावी जंग में इस बार बुलेट ट्रेन की रफ्तार बनाम आम जनता की बुनियादी जरूरतें, बहस का एक बेहद मुख्य केंद्र बनने वाली है.
मोहन भागवत के अमेरिकी दौरे पर देश में राजनीति
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका और कनाडा दौरे ने भारत के भीतर एक नया सियासी घमासान छेड़ दिया है. संघ के शताब्दी वर्ष के वैश्विक प्रचार के तहत उन्होंने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में भारतीय प्रवासियों को संबोधित किया. वहां उन्होंने वसुधैव कुटुंबकम और सार्वभौमिक एकता का संदेश देते हुए कहा कि हिंदुत्व की सोच किसी को बाहर करने की नहीं है. उनके इस बयान पर कांग्रेस और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस पर तीखा पलटवार किया है. विपक्ष का आरोप है कि संघ विदेशों में तो उदारता और विविधता की बातें करता है, लेकिन देश के भीतर उसकी राजनीति इसके बिल्कुल विपरीत है. कर्मभूमि बनाम जन्मभूमि के संदर्भ में भागवत ने अमेरिकी मूल के भारतीयों को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें भारत यानी जन्मभूमि से पहले अमेरिका यानी कर्मभूमि के प्रति वफादार होना चाहिए और वहां के नियमों का पालन करना चाहिए. इसके बाद विपक्ष के कुछ हलकों में इस बयान की भी आलोचना की गई कि यह प्रवासी भारतीयों के सामने दोहरी पहचान और वफादारी का संकट खड़ा करता है. वहीं सत्तापक्ष ने इसे एक परिपक्व और वैश्विक स्तर का संदेश बताया है.
