नयी दिल्ली, (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को संकेत दिया कि सूचना का अधिकार अधिनियम की एक धारा में हुए संशोधन को संवैधानिक चुनौती देने के मामले में नागरिकों के सूचना के अधिकार एवं निजता के मौलिक अधिकार के बीच सावधानी से संतुलन बनाने की आवश्यकता है। इस संशोधन के तहत निजी जानकारी के खुलासे के लिए जनहित के आधार पर छूट का प्रावधान हटा दिया गया था।
न्यायालय ने कहा कि मुख्य मुद्दा यह है कि क्या संसद सभी डिजिटल निजी जानकारी के खुलासे पर पूरी तरह रोक लगा सकती है या क्या कानून को एक संतुलित तरीका अपनाना चाहिए। यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि संशोधन से पहले, आरटीआई अधिनियम के तहत निजी जानकारी को सिर्फ़ कुछ खास हालात में ही छिपाकर रखने की इजाज़त थी जबकि बड़े जनहित में जानकारी का खुलासा करना ज़रूरी माना जाता था।
ये टिप्पणियां मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की बेंच ने ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट’ के ज़रिए ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ में किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कीं।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि न्यायालय को यह देखना होगा कि क्या निजी जानकारी के लिए सुरक्षा का दायरा बढ़ाने का संसद का फ़ैसला संवैधानिक मानकों को पूरा करता है।
दोनों कानूनों की संरचना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जहां आरटीआई अधिनियम जानकारी के सभी रूपों को शामिल करते हुए बहुत बड़े दायरे में काम करता है, वहीं डिजिटल निजी डेटा सुरक्षा अधिनियम एक सीमित दायरे से जुड़ा है; हालांकि, यह दायरा आज सरकारी संस्थाओं के पास मौजूद जानकारी का एक बड़ा हिस्सा है।
याचिकाकर्ताओं की वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा कि यह संशोधन आरटीआई व्यवस्था को मूल रूप से बदल देता है; यह उस सुरक्षा उपाय को हटा देता है जो निजता की सुरक्षा करते हुए व्यापक जनहित में जानकारी के खुलासे को संभव बनाता था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जवाब में अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ़्ते का समय मांगा।
सॉलिसिटर जनरल के अनुरोध स्वीकार करते हुए, न्यायालय ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को कार्यवाही में एक पक्ष के रूप में शामिल किया।
