नशे के साम्राज्य की जड़ पर चोट जरूरी

नशा अब केवल सामाजिक बुराई या कानून-व्यवस्था की चुनौती भर नहीं रह गया है. यह देश की युवा पीढ़ी, अर्थव्यवस्था, सामाजिक ताने-बाने और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुका है. ऐसे में केंद्र सरकार का वर्ष 2029 तक देश को नशामुक्त बनाने का लक्ष्य और 2026 से 2029 के लिए तैयार किया गया तीन वर्षीय समयबद्ध रोडमैप महत्वपूर्ण है. लेकिन इस संकल्प की असली परीक्षा घोषणाओं में नहीं, जमीन पर होने वाली कार्रवाई में होगी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एनसीओआरडी की 10 वीं शीर्ष समिति की बैठक में नशामुक्त भारत अभियान का विजन दस्तावेज जारी किया था. इसमें चार प्रमुख स्तंभ, 25 घटक और 200 से अधिक एक्शन प्वाइंट शामिल हैं. खास बात यह है कि रणनीति में केवल नशीले पदार्थों की बरामदगी और छोटे तस्करों की गिरफ्तारी को सफलता का पैमाना बनाने के बजाय पूरे ड्रग नेटवर्क की आर्थिक और संगठित ताकत को निशाना बनाने पर जोर दिया गया है. यही इस लड़ाई की सबसे जरूरी दिशा है. ड्रग तस्करी का कारोबार तभी फलता-फूलता है, जब उसके पीछे पैसा, नेटवर्क और संरक्षण का तंत्र मौजूद हो. इसलिए तस्करों की संपत्तियां जब्त और फ्रीज करना, उनके वित्तीय ढांचे को ध्वस्त करना और विदेशों में बैठे शीर्ष भगोड़ों को भारत वापस लाना केवल कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि ड्रग कारोबार की रीढ़ पर प्रहार है. 2029 तक विदेशों में सक्रिय 100 शीर्ष भगोड़ों को भारत लाने का लक्ष्य रखा गया है.

दरअसल,सिंथेटिक और रासायनिक ड्रग्स ने चुनौती को और जटिल बना दिया है. गुप्त प्रयोगशालाओं की पहचान, उनके खिलाफ कार्रवाई और प्रीकर्सर रसायनों की निर्माण प्रक्रिया से लेकर उपयोग तक 100 प्रतिशत डिजिटल ट्रैकिंग की योजना इसी बदलते खतरे को ध्यान में रखकर बनाई गई है. लेकिन डिजिटल निगरानी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संदिग्ध गतिविधियों की सूचना मिलने के बाद एजेंसियां कितनी तेजी से कार्रवाई करती हैं. तकनीक तभी उपयोगी है, जब वह कार्रवाई की गति बढ़ाए.

इस अभियान का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष नशे की मांग को कम करना है. तस्करी पर कितनी भी कार्रवाई क्यों न हो, यदि बाजार बना रहेगा तो नए तस्कर और नए नेटवर्क खड़े होते रहेंगे. स्कूल और कॉलेज परिसरों के आसपास 500 मीटर के क्षेत्र को सुरक्षित बनाने का प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण है. युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए जागरूकता के साथ नशामुक्ति और पुनर्वास की सुविधाओं का विस्तार भी जरूरी है. नशे के आदी व्यक्ति को केवल अपराधी मानकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता; उसे इलाज और पुनर्वास की भी जरूरत है. मार्च 2027 तक प्रत्येक राज्य में पूरी तरह सुसज्जित एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स बनाने और मामलों में 30 दिन के भीतर फॉरेंसिक रिपोर्ट उपलब्ध कराने का लक्ष्य भी समयबद्ध कार्रवाई की दिशा में महत्वपूर्ण है.

दरअसल,नशे के खिलाफ लड़ाई सरकार अकेले नहीं जीत सकती. ‘होल ऑफ गवर्नमेंट’ के साथ ‘होल ऑफ सोसाइटी’ की सोच को व्यवहार में उतारना होगा. एनसीसी, एनएसएस और माय भारत के माध्यम से एक लाख नशामुक्त मित्र तैयार करने की योजना युवाओं को इस अभियान का सक्रिय भागीदार बना सकती है. परिवार, स्कूल, कॉलेज, सामाजिक संगठन और स्थानीय समुदाय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.नशे के खिलाफ अब आधे-अधूरे प्रयास की गुंजाइश नहीं है. 2029 का लक्ष्य बड़ा है और समय सीमित. इसलिए सफलता का पैमाना जब्त की गई ड्रग्स की मात्रा या गिरफ्तारियों की संख्या नहीं, बल्कि टूटते तस्करी नेटवर्क, सूखता अवैध धन, सुरक्षित होते शैक्षणिक परिसर, घटती मांग और बेहतर पुनर्वास होना चाहिए.

 

 

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