दीपावली केवल दीप जलाने, घर-आंगन सजाने और सुख-समृद्धि की कामना करने का पर्व नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर और समाज में व्याप्त अंधकार को दूर करने का संकल्प लेने का अवसर भी है. प्रकाश पर्व का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होता है, जब उसका उजास किसी एक घर की देहरी तक सीमित न रहकर पूरे समाज को आलोकित करे. अपने घर को दीपमालाओं से सजाते समय उन चेहरों को भी स्मरण रखना चाहिए, जिनके जीवन में अभाव का अंधकार है. किसी जरूरतमंद के घर मिठाई पहुंचाना, किसी श्रमिक परिवार में खुशियों का दीप जलाना और किसी वंचित बच्चे के चेहरे पर मुस्कान लाना भी दीपावली की सच्ची सार्थकता है. आखिर रोशनी बांटने से घटती नहीं, उसका विस्तार होता है.
भारतीय संस्कृति में गणेश और लक्ष्मी की संयुक्त आराधना में जीवन का गहन दर्शन छिपा है. लक्ष्मी समृद्धि की प्रतीक हैं, तो गणेश विवेक और बुद्धि के अधिष्ठाता. धन अर्जित करना आवश्यक है, लेकिन उसके साथ विवेक न हो तो समृद्धि अहंकार और सामाजिक विषमता का कारण बन सकती है. धन की सार्थकता उसके संग्रह में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग और लोकमंगल में है. जिस संपन्नता से दूसरों के जीवन में भी खुशहाली आए, वही वास्तविक समृद्धि है.
इस दीपावली पर आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन का संकल्प भी हमारे उत्सव का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए. आत्मनिर्भर भारत का निर्माण केवल सरकारी योजनाओं और नीतियों से संभव नहीं है. इसकी आधारशिला प्रत्येक नागरिक का स्वावलंबी होना है. जब व्यक्ति अपने श्रम, कौशल और सामर्थ्य से जीवन को दिशा देने में सक्षम होगा, तभी परिवार आत्मनिर्भर बनेंगे और परिवारों की आत्मनिर्भरता से राष्ट्र की आर्थिक शक्ति बढ़ेगी.
आज भारत के सामने इस संकल्प को साकार करने के अनुकूल अवसर हैं. विनिर्माण, कृषि, तकनीक, अवसंरचना, स्टार्टअप और सेवा क्षेत्र में बढ़ती संभावनाएं देश की आर्थिक ऊर्जा को नई दिशा दे रही हैं. वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा भी उसकी सामर्थ्य का प्रमाण है. किंतु विकास की वास्तविक कसौटी केवल आर्थिक आंकड़े नहीं, बल्कि यह है कि उसकी रोशनी समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितनी पहुंची. महानगरों की जगमगाहट के बीच अंधेरे में डूबे गांव, रोजगार की तलाश में भटकते युवा और आजीविका के लिए संघर्ष करते छोटे उद्यमी हमारी विकास यात्रा की चुनौतियां हैं.
दरअसल,स्वावलंबन को जनआंदोलन बनाने के लिए किसान, युवा, महिलाएं, कारीगर और छोटे उद्यमियों को आर्थिक अवसरों से जोडऩा होगा. दीपावली पर स्थानीय कुम्हारों के बनाए दीपक, हस्तशिल्प और स्वदेशी उत्पाद खरीदना भी राष्ट्र निर्माण में भागीदारी का एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण कदम है. समृद्ध भारत वही होगा, जिसमें विकास का लाभ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचे.कोई भी राष्ट्र केवल सरकारी प्रयासों से महान नहीं बनता. उसके नागरिकों का कर्तव्यबोध, श्रम और सामाजिक संवेदना ही उसकी वास्तविक शक्ति होते हैं. दीपावली हमें अपने भीतर के अंधकार को दूर कर लोभ के स्थान पर उदारता, परावलंबन के स्थान पर स्वावलंबन और व्यक्तिगत सुख के स्थान पर सामूहिक कल्याण का भाव अपनाने की प्रेरणा देती है.आइए, इस दीपावली पर अपने घरों को तो रोशन करें ही, उन घरों तक भी उजाला पहुंचाएं जहां अभी अंधेरा है. दरअसल,हमारा संकल्प ऐसा भारत बनाने का हो, जो अपने श्रम से समृद्ध, अपने कौशल से आत्मनिर्भर और अपनी उदारता से विश्व का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो. यही दीपावली का वास्तविक संदेश और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का सच्चा मार्ग है.
