मुंबई 06 अगस्त (वार्ता) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश की नयी पीढ़ी को ईमानदार और देशभक्त बताते हुए कहा है कि उनकी बात सुनी जानी चाहिए। संवाद की कमी के कारण ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर विद्यार्थियों आंदोलन हुआ।
श्री भागवत ने गुरुवार को यहां एक कार्यक्रम में कहा, “जेन-जी और जेन-अल्फा, पुरानी पीढ़ी से भी ज्यादा देशभक्त और ईमानदार है। हमें उनकी बात सुननी चाहिए। उनसे बातचीत में कमी के कारण ही दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन हुआ।” उन्होंने कहा कि युवाओं की शिकायतें वाजिब है और उन पर गौर किया जाना चाहिए। यह कार्यक्रम नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में इंडिया इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस (आईआईएमयूएन) के 15वें स्थापना दिवस के मौके पर आयोजित किया गया था
उन्होंने कहा कि बच्चों को भगवान का रूप माना जाता है, लेकिन आंदोलन के दौरान उन पर लाठीचार्ज और पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ। यह क्यों हुआ और किन परिस्थितियों में हुआ, पहले उसका कारण जानना होगा। तभी तय किया जा सकता है कि गड़बड़ी कहां हुई। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन सहमति बनाने का एक वैध माध्यम है। जब संवाद से समाधान नहीं निकलता, तब आंदोलन किया जा सकता है, लेकिन उसका उद्देश्य समाज में विभाजन पैदा करना नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार लाना होना चाहिए।
संघ प्रमुख ने कहा कि हाल के छात्र आंदोलनों में युवाओं की शिकायतें वास्तविक हैं। भारत की शिक्षा व्यवस्था में अभी भी कई कमियां हैं, जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इन मुद्दों पर सरकार और समाज को युवाओं के साथ संवाद करना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनकी पीढ़ी बिना सवाल किए बड़ों की बात मान लेती थी, लेकिन आज की जेन जी और जेन अल्फा हर बात का तार्किक उत्तर चाहती हैं। उनके अनुसार, लोकतंत्र में विचार-विमर्श और बहस के माध्यम से ही सही समाधान निकलता है। उन्होंने भारतीय परंपरा के शास्त्रार्थ का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग दृष्टिकोणों से सत्य की व्यापक समझ विकसित होती है।
श्री भागवत ने कहा कि वह यह नहीं मानते कि युवाओं को आंदोलन नहीं करना चाहिए, लेकिन लोकतंत्र में आंदोलन की भी एक मर्यादा और प्रक्रिया होती है। उन्होंने कहा कि युवाओं की आवाज़ विरोध के लिए नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उठ रही है। आंदोलन किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार के लिए होना चाहिए। उन्होंने प्रदर्शन करने वाले छात्रों को ‘राष्ट्रविरोधी’ बताए जाने पर कि यदि जेन जी आंदोलन कर रही है तो इसका मतलब यह नहीं कि वे राष्ट्रविरोधी हैं। उन्होंने कहा, “वे हमारे अपने लोग हैं, देश की अगली पीढ़ी हैं।” उन्होंने कहा कि उनके अनुभव में जेन जी और अल्फा वर्तमान पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार हैं और देशभक्ति तथा समाज सेवा की भावना से प्रेरित है। उन्होंने कहा, ” शिक्षा वाणिज्यिक व्यवसाय नहीं है। वह सर्वसुलभ हो, ऐसी अवसंरचना होनी चाहिए। ऐसा किसी ने नहीं कहा कि सरकार ही पूरी शिक्षा चलाये। हमें भी सहयोग करना होगा। तभी सुधार होगा। बाद में पाठ्यक्रम की बात आनी चाहिए।”
इस दौरान उन्होंने आरक्षण को लेकर पूछे गये सवाल पर कहा कि जब तक सामाजिक भेदभाव है, तब तक आरक्षण रहेगा। उन्होंने कहा, “मैं आपको सीधे जवाब नहीं दूंगा। मैं आपसे कहूंगा कि आप देखें कि डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर आरक्षण के बारे में क्या सोचते थे। अगर हम ईमानदारी से उनकी सलाह मानें, तो कोई समस्या नहीं है।” उन्होंने कहा कि आरक्षण सामाजिक कारणों से है। जब तक सामाजिक भेदभाव रहेगा, आरक्षण जारी रहेगा। जिन्हें यह मिला है और जिनकी हालत बेहतर हुई है, अगर उन्हें लगता है कि उन्हें अब इसकी ज़रूरत नहीं है, तो उन्हें इसे छोड़ देना चाहिए।
श्री भागवत ने कहा, “अब बड़े पैमाने पर हमने इसका लाभ उठाया है, हमारी स्थिति अब ठीक है, इसलिए इसे दूसरों को दें। कुछ राज्यों में वर्गीकरण की मांग उठी है, और उच्चतम न्यायालय ने भी हाल ही में इसका ज़िक्र किया है। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि यह सभी को मिलना चाहिए।आरक्षण पाने वालों में एक वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि यह हमारी उन्नति के लिए है। यह कोई स्थायी उपाय नहीं है। हमें इसका फ़ायदा उठाना है, खुद को बेहतर बनाना है और इसे उन लोगों के लिए उपयोगी बनाना है जिन्हें यह अभी तक नहीं मिला है।”
इस दौरान श्री भागवत ने सोशल मीडिया के प्रभाव पर का भी उल्लेख किया और कहा कि केवल कानून बनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि नियम तभी प्रभावी होते हैं, जब समाज उन्हें स्वेच्छा से स्वीकार करे। उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रभाव रखने वाले लोगों से जिम्मेदारी निभाने की अपील करते हुए कहा कि उनके कारण उनके अनुयायी गलत दिशा में नहीं जाने चाहिए।
उन्होंने फर्जी वीडियो और झूठी जानकारियों के बढ़ते खतरे का उल्लेख करते हुए लोगों से अपील की कि किसी भी सामग्री पर विश्वास करने से पहले उसकी विश्वसनीय स्रोतों से पुष्टि करें। भागवत ने कहा कि सोशल मीडिया के उपयोग में आत्म-अनुशासन जरूरी है, क्योंकि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्याएं समाप्त नहीं होतीं, बल्कि वे दूसरे रास्तों से फैलने लगती हैं।
श्री भागवत ने पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के आम लोगों के रिश्तों का उल्लेख करते हुए “टकराव के समय हमें अपनी सरकार के फ़ैसले के साथ चलना होता है, लेकिन इससे पहले से बने रिश्ते नहीं टूटने चाहिए। चीन के लोग कहते हैं कि 2000 साल पहले भारत ने उन्हें कुछ मूल्य दिये थे और पाकिस्तान 100 साल से भी कम समय पहले भारत का ही हिस्सा था। यह बात नहीं भूलनी चाहिए।” उन्होंने कहा कि रिश्ते खत्म नहीं किए जा सकते, टकराव रहने तक इन्हें कुछ समय के लिए रोका जा सकता है, लेकिन भारत का समाधान क्या है? उन्होंने कहा कि भारतीय समाधान दूसरों को जीतना या खत्म करना नहीं है, बल्कि एक ऐसा तालमेल वाला और सबको साथ लेकर चलने वाला तरीका अपनाना है जिसमें बातचीत की ज़रूरत होती है। इसलिए, टकराव इन रिश्तों को रोक तो सकता है लेकिन खत्म नहीं कर सकता और न ही ऐसा होना चाहिए।
संघ प्रमुख कहा, “कभी-कभी टकराव खत्म होने के बाद हमें वहीं से आगे बढ़ना होता है जहाँ हमने छोड़ा था। इसलिए, हमेशा नफ़रत और दुश्मनी बनाए रखना समाधान नहीं है। जब कोई परेशानी आती है, तो हमें उसे संभालना होता है और उसे संभालने का एक तरीका भी होता है। हमें उस तरीके को अपनाना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि यह सब कुछ समय के लिए होता है, यह राजनीति की वजह से होता है। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तानी दिल से भारतीयों के दुश्मन हैं, या भारतीय ऐसे हैं। लेकिन देश, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ भी होती हैं – यह भी जीवन की एक लड़ाई है।
