
विंध्य की डायरी डॉ रवि तिवारी।
पिछले दो-ढाई दशक से सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी के अंदर असन्तोष न पनपे इसको लेकर संगठन की नयी कार्यकारणी में जिन चेहरों को अवसर दिया गया है ,उससे जातीय सन्तुलन तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है, लेकिन पार्टी के प्रभावी नेताओं को अवसर न मिल पाना आने वाले समय में सत्ता की सीढ़ी के लिए रोड़ा बन सकती है. हालांकि राजनैतिक नियुक्तियों से बचे लोगो को संगठन में शामिल कर पार्टी ने विंध्य में सूझबूझ का परिचय दिया है. पिछले कई वर्षों से सक्रिय राजनीति से दूर लोगो को मुख्यधारा में लाकर पार्टी ने आने वाले समय में उनका उपयोग अभी से सुनिश्चित कर दिया है. प्रदेशाध्यक्ष हेमन्त खण्डेलवाल ने सीधे सभी को कार्यसमिति का सदस्य बना कर विशेष महत्व की सम्भावना को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है. जानकारों का कहना है कि आने वाले समय में योग्यता के आधार पर सदस्यों को जिम्मेदारी दी जा सकती है. जानकार यह भी मान रहे हैं कि ये भविष्य में सत्ता के असन्तोष को कम करने में सहयोगी साबित हो सकते हैं.
हाथ से निकल गई सौगात, जिम्मेदार बेखबर
स्मार्ट सिटी सतना को मिलने वाली 20 इलेक्ट्रिक सिटी बसों की सौगात हाथ से निकल गई और जिम्मेदारों को इसकी खबर तक नहीं लगी. रही बात महापौर और सांसद की तो उनको भी भनक नहीं लगी. अब जनता का गुस्सा फूट रहा है. दरअसल बसों की मंजूरी निरस्त होने के फैसले की खबर जिम्मेदार परिवहन विभाग तक को नहीं लगी. सतना महापौर योगेश ताम्रकार और सांसद गणेश सिंह को भी ई-बसों की सौगात छिन जाने की खबर नहीं हुई. इतनी बड़ी सौगात हाथ से निकल जाने पर जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठना लाजमी है. अब सतना का हक वापस दिलाने जनता की आवाज उठने लगी है. यह मामला जनभावना से जुड़ा मुद्दा बन गया है. यह केवल ई-बसों का मामला ही नही बल्कि सतना के विकास और उसके अधिकारों की अनदेखी मानी जा रही है. अगर समय रहते जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार अधिकारी सक्रिय होते तो यह सौगात बचाई जा सकती थी. मई के महीने में ही बसों का आवंटन रद्द कर दिया गया था, लेकिन सभी जिम्मेदार चुप्पी साधे बैठे रहे. एक तो बड़ी सौगात मिल नहीं रही और जो आ रही है वह भी हाथ से निकल रही है. ऐसे में जिम्मेदारों की निष्क्रियता पर सवाल तो उठेगा ही.
‘सामंतवादी’ पोस्ट पर हाथापाई
कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी कलह थमने का नाम नही ले रही है. अनुशासन एवं एकता का पाठ केवल मंचों और भाषणों तक ही सीमित रह गया है. कार्यकर्ता पार्टी के सिद्धांतों पर बहस करने के बजाय नेताओं की टिप्पणी पर पहरा देने लगे है. पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्ता पहले होते थे पर अब नेताओं के प्रति समर्पण भाव रखते हैं . हाल ही में सीधी विधानसभा के प्रभारी डा. विनोद शर्मा के साथ कथित रूप से हाथापाई इसी का परिणाम है. दरअसल ‘सामंतवाद’ को लेकर सोशल मीडिया पर की गई एक टिप्पणी ने विवाद की स्थित निर्मित कर दी. संगठन ने बगैर समय गवाए अति-उत्साही दो कार्यकर्ताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया. अब सवाल यह उठता है कि क्या समय रहते संवाद स्थापित कर आपत्ति वाले शब्दों पर विचार-विमर्श कर विवाद को शांत कराने का प्रयास नहीं किया जा सकता था? संगठन द्वारा की गई कार्यवाई क्या समाधान है या फिर उसके पीछे के कारणों संवाद की कमी और संगठनात्मक समन्वय पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार होना चाहिये. निश्चित रूप से दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है. कार्यवाई संगठन का एक हिस्सा हो सकती है लेकिन आत्ममंथन उससे भी अधिक आवश्यक है. कांग्रेस के अंदर आपसी संवाद की कमी लगातार हो रही है. यही वजह है कि आपसी गुटबाजी से कांग्रेस उभर नहीं पा रही है.
