
मालवा- निमाड़ की डायरी संजय व्यास। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी ने जिस शख्स को संघी बताते हुए मुख्यमंत्री मोहन यादव को घेरने की कोशिश की उसमें वे मात खा गए हैं. विगत दिनों दिल्ली पहुंच कर एक पत्रकार वार्ता में जीतू पटवारी ने श्रीराम तिवारी के बहाने मुख्यमंत्री पर भूमि घोटाले के गंभीर आरोप लगाए थे. पटवारी को उनकी पृष्ठभूमि की जानकारी नहीं है. श्रीराम तिवारी कोई अचानक से उभर कर मुख्यमंत्री से नहीं जुड़े हैं. उन पर आरएसएस का तमगा लगाना भी बेबुनियाद है. श्रीराम 80 के दशक में संस्कृति विभाग से जुड़े. तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के वे चहेते रहे और मध्य प्रदेश कला परिषद के अध्यक्ष के तौर पर पदासीन थे. उन्होंने संस्कृति विभाग की पत्रिका पूर्वाग्रह, कलावार्ता का वर्षों संपादन किया. यह सिलसिला बाद की सरकारों में भी चलता रहा. उन्हें बाद में संस्कृति विभाग ने वीर भारत न्यास का गठन किया तब श्रीराम तिवारी को न्यासी सचिव बनाया था. चूंकि वे उज्जैन से ताल्लुक रखते हैं, सो भाजपा की मोहन यादव सरकार ने महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के निदेशक की बागडोर सौंपी थी. इसी के साथ श्रीराम तिवारी को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का संस्कृति सलाहकार बनाया गया. अत: श्री राम की पृष्ठभूमि को देखते हुए जीतू पटवारी का उन्हें संघी बताना निराधार है. यही नहीं वीर भारत न्यास से अनभिज्ञ पटवारी ने अपने आरोप में उसे संघ का बता दिया. इसीलिए दिग्विजय सिंह सहित वरिष्ठ कांग्रेसियों ने पटवारी के आरोपों से किनारा कर लिया.
जीतू को उलझाकर गायब
जीतू पटवारी को ज्ञान देकर मुख्यमंत्री को घेरने की योजना देने वाले तो परिदृश्य से गायब हैं, पर पटवारी खुद उलझ गए हैं. जीतू पटवारी की कानूनी मुसीबत बढ़ सकती हैं. मुख्यमंत्री मोहन यादव और सरकार को घेरते हुए 500 करोड़ रुपए कीमत की जमीन संघ का न्यास बताते हुए वीर भारत न्यास को 1 रुपए में देने के आरोप का उनका दांव उल्टा पड़ गया है. न्यास के सचिव श्रीराम तिवारी ने पटवारी को 5 करोड़ रुपए मानहानि का कानूनी नोटिस भेज दिया. इसमें सार्वजनिक रूप से आरोप वापस लेने और माफी मांगने को कहा गया है अगर वे ऐसा नहीं करते, तो उन्हें न्यायालय का सामना करना पड़ेगा. यदि न्यास के बारे में सही जानकारी न होने की बात कहकर अपने आरोप वापस लेते हैं तो फजीहत अलग होगी. पार्टी के अन्य नेताओं का इस मामले में पल्ला झाड़ लेने और सहयोग न करने की वजह से जीतू पटवीरी फिलहाल अलग-थलग पड़ गए हैं.
आप, अपना दल… अब शिवसेना
कांग्रेस-भाजपा में होते रहे सीधे मुकाबले के बीच अन्य दलों को मंदसौर जिले में ऐसा क्या नजर आ रहा है कि वे सक्रियता बढ़ा रहे हैं. प्रदेश के मुख्य दोनों दलों के अलावा अन्य की जनता के बीच कोई दखलंदाजी नहीं है, यह जानकर भी विगत कई समय से राजनीतिक पार्टियां यहां पैर पसारने में जुटी हुई हैं. राजस्थान से सटे इस क्षेत्र में वहां की प्रभावशाली भारत आदिवासी पार्टी का प्रयास तो समझ में आता है, पर विभिन्न राज्यों के क्षेत्रीय दल की तैयारी समझ से परे है. उत्तर प्रदेश के अपना दल के बाद अब महाराष्ट्र की शिव सेना (एकनाथ शिंदे) गतिमान नजर आ रही है. हाल ही में यहां शिवसेना युवा सेना के संगठन विस्तार के तहत मंदसौर जिले में विभिन्न पदों पर नियुक्तियों की घोषणा की गई. शिवसेना युवा सेना को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए जनहित एवं संगठन हित में कार्य करने का संदेश भी दिया गया. अब यह इकाई कितना कुछ कर पाती है समय बताएगा. इसके पहले आम आदमी पार्टी भी संगठन विस्तार में यहां कूद चुकी है.
