एंग्जायटी और व्यवहार: व्यक्ति की सोच, भावनाएं और बॉडी लैंग्वेज का संबंध

एंग्जायटी और व्यवहार: व्यक्ति की सोच, भावनाएं और बॉडी लैंग्वेज का संबंध

किसी भी व्यक्ति का व्यवहार उसकी सोच और मानसिक स्थिति का प्रतिबिंब होता है। व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में जो विचार उत्पन्न होते हैं, वही उसके व्यवहार, भाषा, बॉडी लैंग्वेज और चेहरे के हाव-भाव के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं। यही कारण है कि किसी व्यक्ति को समझने के लिए केवल उसकी बातों को सुनना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसके हाव-भाव, शारीरिक गतिविधियों और प्रतिक्रियाओं का भी अवलोकन करना आवश्यक होता है।

व्यक्ति अपने विचारों और भावनाओं को मुख्य रूप से तीन तरीकों से व्यक्त करता है—वर्बल लैंग्वेज (बोलचाल की भाषा), बॉडी लैंग्वेज (शारीरिक संकेत) और फेशियल एक्सप्रेशन्स (चेहरे के भाव)। ये तीनों संकेत यह बताते हैं कि व्यक्ति के अंदर क्या चल रहा है और वह मानसिक रूप से किस स्थिति में है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति एंग्जायटी (घबराहट) या बेचैनी का अनुभव कर रहा है, तो उसके व्यवहार में कई बदलाव दिखाई देने लगते हैं। वह एक जगह स्थिर होकर नहीं बैठ पाता, बार-बार पैर हिलाता है, हाथों की उंगलियां मरोड़ता है या शरीर में लगातार हलचल बनाए रखता है। उसकी दिल की धड़कन तेज हो सकती है, गला सूख सकता है, सांसें तेज चल सकती हैं तथा हाथ-पैरों में कंपन महसूस हो सकता है। ये सभी संकेत उसकी मानसिक स्थिति को दर्शाते हैं।

इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति डिप्रेशन (अवसाद) से गुजर रहा हो, तो उसकी बॉडी लैंग्वेज अपेक्षाकृत धीमी और निष्क्रिय दिखाई देती है। वह आंखों में आंखें डालकर बात करने से बच सकता है, उसकी आवाज धीमी हो सकती है और किसी प्रश्न का उत्तर देने में सामान्य से अधिक समय लग सकता है। उसके चेहरे पर उदासी, निराशा और ऊर्जा की कमी स्पष्ट दिखाई दे सकती है। इसलिए केवल किसी व्यक्ति को देखकर उसके बारे में निष्कर्ष निकाल लेना उचित नहीं होता। उसकी भावनात्मक स्थिति को समझने के लिए उसके व्यवहार, बातचीत और शारीरिक संकेतों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करना आवश्यक है।

एंग्जायटी डिसऑर्डर क्या है?

एंग्जायटी डिसऑर्डर एक ऐसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या है जिसमें व्यक्ति को सामान्य परिस्थितियों की तुलना में अत्यधिक और लगातार घबराहट, चिंता या भय महसूस होता है। यह समस्या बच्चों, युवाओं, वयस्कों और बुजुर्गों—सभी आयु वर्ग के लोगों में देखी जा सकती है।

सामान्य घबराहट और एंग्जायटी डिसऑर्डर में अंतर होता है। किसी विशेष परिस्थिति में थोड़ी देर के लिए घबराना सामान्य बात है, लेकिन जब घबराहट अत्यधिक हो, लंबे समय तक बनी रहे और दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तब इसे एंग्जायटी डिसऑर्डर माना जाता है।

एंग्जायटी डिसऑर्डर के प्रकार

कुछ लोगों को विशेष परिस्थितियों में घबराहट होती है। उदाहरण के लिए—

* लिफ्ट या बंद जगहों में जाने पर डर लगना।
* भीड़भाड़ वाली जगहों पर घबराहट होना।
* पानी देखकर डर लगना।
* कुत्तों या अन्य जानवरों से अत्यधिक भय होना।
* मंच पर बोलने या लोगों के सामने आने से घबराना।

ऐसी स्थिति को सिचुएशन-बेस्ड या स्पेसिफिक एंग्जायटी कहा जाता है।

दूसरी ओर, कुछ लोगों को लगभग हर परिस्थिति में चिंता बनी रहती है। उन्हें हमेशा किसी अनहोनी की आशंका सताती रहती है। जैसे—

* बॉस बुला लें तो डर लगना कि कहीं कोई समस्या न हो।
* शिक्षक बुलाएं तो घबराहट होना।
* परिवार का कोई सदस्य बुलाए तो चिंता होना।
* अचानक तेज आवाज सुनकर अत्यधिक डर जाना।

इसे सामान्यीकृत चिंता विकार (Generalized Anxiety Disorder) कहा जाता है।

एंग्जायटी के भावनात्मक और मानसिक लक्षण

एंग्जायटी के दौरान व्यक्ति को कई प्रकार के मनोवैज्ञानिक लक्षण अनुभव हो सकते हैं, जैसे—

* लगातार चिंता बनी रहना।
* किसी अनजाने खतरे का भय महसूस होना।
* नकारात्मक विचारों का बार-बार आना।
* बेचैनी और असुरक्षा की भावना।
* ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई।
* चिड़चिड़ापन बढ़ जाना।
* भविष्य को लेकर अत्यधिक चिंता करना।

एंग्जायटी के शारीरिक लक्षण

एंग्जायटी केवल मानसिक ही नहीं बल्कि शारीरिक स्तर पर भी दिखाई देती है। इसके प्रमुख लक्षण हैं—

* दिल की धड़कन तेज हो जाना।
* सांसों का तेज चलना।
* हाथ-पैरों में कंपन होना।
* पसीना आना।
* गला सूखना।
* सीने में घबराहट महसूस होना।
* एक जगह स्थिर न रह पाना।
* बार-बार पैर हिलाना या टहलना।
* मांसपेशियों में तनाव महसूस होना।
* नींद में समस्या आना।

 बच्चों और बड़ों में एंग्जायटी

बच्चों और बड़ों में एंग्जायटी के मूल लक्षण लगभग समान होते हैं, लेकिन उनकी अभिव्यक्ति अलग हो सकती है।

*बच्चों में:

* माता-पिता से अलग होने का डर।
* स्कूल जाने में घबराहट।
* बार-बार रोना या चिड़चिड़ापन।
* पेट दर्द या सिर दर्द की शिकायत।
* पढ़ाई में ध्यान न लगना।

*बड़ों में:*

* काम और जिम्मेदारियों को लेकर अत्यधिक चिंता।
* सामाजिक परिस्थितियों से बचना।
* नींद की समस्या।
* तनाव और थकान महसूस होना।
* बार-बार नकारात्मक सोच आना।

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DrRuma Bhattacharya

मनोचिकित्सा  विशेषज्ञ

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