“परिवार में मांँ के रूप में नारी का स्थान “

परिवार के दो स्तंभ पुरूष और नारी, उन्हीं के संयुक्त प्रयास से परिवार बनते और चलते हैं,किन्तु परिवार के सुव्यवस्था का उत्तरदायित्व नारी के कंँधों पर आता है।
नारी परिवार की धूरी है। धूरी के बिना पहियों की गतिशीलता और उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है ।धूरी के कमजोर पड़ने पर सारी तिलियां एक-एक करके बिख़रने लगती हैं ,ठीक यही बात परिवार में नारी के संबंध में भी है ।
नारी परिवार की धूरी है ,उसके संवेदन सूत्र ही परिवार को जोड़े रखते हैं ।उनके टूटते ही परिवार को बंँटते, बिखरते, टूटते,नष्ट होते देर नहीं लगती।
मांँ के रूप में नारी की ममता अद्वितीय मिसाल है।नारी का सबसे पवित्र रूप मांँ के रूप में देखने में आता है।मां को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है।मांँ देवकी(कृष्ण)मांँ पार्वती(गणेश/कार्तिकेय)के संदर्भ में देख सकते हैं।
मांँ अपने बच्चों के सुख़ के लिए अपना सर्वस्व त्यागने के लिए तैयार रहती है। वह बच्चों की देखभाल के लिए अपना भूख़ ,प्यास ,नींद सभी को भूलकर बच्चों और परिवार के लिए अपना समय लगाती है ।नारी सृष्टि की रचयिता है। मांँ के रूप में नारी का योगदान समाज में अमूल्य होता है। आज नारियों में विभिन्न क्षेत्रों में विकास किया है, लेकिन वह आंतरिक रूप से आज भी कमजोर हैं।
परिवार समाज की छोटी इकाई होती है, अगर परिवार के सदस्य सुसंस्कृत और शिक्षित होंगे तो वह देश भी अच्छी सभ्यता वाला देश कहलाएगा।
परिवार की महत्वपूर्ण इकाई नारी है। नारी के बिना परिवार की कल्पना नहीं की जा सकती ,वहीं परिवार के नींव का पत्थर होती है ।बेटी,पत्नी, मांँ, बहन हर रूप में नारी का योगदान अमूल्य होता है,उसमें त्याग और समर्पण की भावना होती है।
मांँ अपने बच्चों के लिए अपना हर वसंत कुर्बान कर देती है।विश्व में महान चरित्र जैसे बालक ध्रुव,वीर शिवाजी,ईश्वरचंद विद्यासागर, लाल बहादुर शास्त्री,महात्मा गांधी, लाला राजपत राय,महाराज छत्रसाल को गढ़ने में उनकी माताओं का सबसे बड़ा योगदान रहा है।
“स्वामी विवेकानंद जी ने नारी चेतना के संबंध में कहा है… कि “भारतीय तुम मत भूलना कि स्त्रियों का आदर्श सीता, सावित्री, दमयंती है”।
परिवार के लिए नारी शक्ति स्वरूपा है।घर परिवार का वातावरण उसी के आचरण पर निर्भर करता है। बच्चा जब जन्म लेता है तो मांँ के स्तन का अमृत पीकर पुष्ट होता है, उन्ही से हंँसनाऔर बोलना सीखता है, और उन्हीं के स्नेह जल के द्वारा वह पोषित होता है,उन्हीं से अच्छे संस्कार लेकर अपने जीवन की दिशा तय करता है। परिवार के स्तर एवं वातावरण को बनाने में सुसंस्कृत नारी की भूमिका होती है।परिवार के अन्य सदस्य उनके सहायक होते हैं, निर्णायक नहीं।पुरूष बाहर जाकर परिश्रम करके धन कमाता है, और नारी घर में उसकी सुख- सुविधा का प्रबंध करती है । खाने- पीने व आराम का प्रबंध करती है।
शिक्षा सफलता की कुंँजी है,यदि नारी शिक्षित होगी, तो वह अपने परिवार की व्यवस्था को अच्छी तरह चला सकेगी।
भारतीय समाज में नारी को मातृशक्ति के पद पर प्रतिष्ठित रखा है, उन्होंने ऐसे मानव रत्न समाज को दिया है, जिनका नाम आज भी अमर है। नारी को जब-जब गृहस्वामिनी, गृहलक्ष्मी कुलमाता के रूप में आदर दिया गया है ,तब-तब भारत का नाम विश्व में गूंँजा है।
कहा भी गया है..
” यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता “।
हमारे वेद पुराण में भी नारी को बराबरी का स्थान दिया गया है।आज भारतीय नारियांँ देश की संस्कृति, सभ्यता एवं धर्म की संरक्षिका बनी हुई है, और साथ ही गृहस्थी, परिवार, देश, समाज एवं घर के संचालन में महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान है।परिवार के संचालन में जो भूमिका नारी की होती है, वह किसी अन्य सदस्य की नहीं हो सकती। नारी परिवार की धड़कन होती है ,और वह परिवार का संतुलन भी बनाए रखती है।
अंत में इतना कहूंँगी कि,परिवार समाज व राष्ट्र में हर महिला का सम्मान होना चाहिए, क्योंकि दुनिया में उनकी आधी आबादी के बलबूते पर ही आदमी यहाँ तक आया है,उसका तिरस्कार,या अपमान कतई उचित नहीं है।
भारतीय संस्कृति में महिलाओं को देवी,दुर्गा व लक्ष्मी का सम्मान दिया गया है।अत:उन्हें उचित सम्मान देना चाहिए
श्रीमती शोभारानी तिवारी,
