राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा लश्कर-ए-तैयबा के शीर्ष आतंकी हाफिज सईद के दो करीबी सहयोगियों सहित 23 आतंकियों को आतंकवादी घोषित किया जाना भारत की आतंकवाद विरोधी नीति का एक महत्वपूर्ण कदम है. इस सूची में जम्मू-कश्मीर से लेकर कर्नाटक के बेंगलुरु तक फैले ऐसे तत्व शामिल हैं, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आतंकवादी गतिविधियों, भर्ती, कट्टरपंथ के प्रचार और आतंकी संगठनों को सहयोग देने में सक्रिय रहे हैं. यह कार्रवाई स्पष्ट संकेत देती है कि भारत अब केवल सीमा पार से होने वाले हमलों का जवाब देने तक सीमित नहीं है, बल्कि आतंकवाद के पूरे तंत्र को ध्वस्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
पिछले एक दशक में भारत ने आतंकवाद के विरुद्ध अपनी रणनीति में व्यापक बदलाव किया है. सुरक्षा बलों की कार्रवाई, खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, आधुनिक तकनीक का उपयोग और आतंकवाद के वित्तीय स्रोतों पर प्रहार ने आतंकी संगठनों की क्षमता को काफी हद तक कमजोर किया है. अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था और अधिक मजबूत हुई है तथा अनेक आतंकी मॉड्यूल समय रहते ध्वस्त किए गए हैं.
हालांकि, चुनौती अभी समाप्त नहीं हुई है. आतंकवादी संगठन अब सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर युवाओं को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं. कट्टरपंथी विचारधारा का प्रसार, फर्जी प्रचार और ऑनलाइन भर्ती आज सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौती बन चुके हैं. इसलिए केवल हथियारबंद आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके वैचारिक और डिजिटल नेटवर्क को भी पूरी तरह समाप्त करना होगा.
यह भी ध्यान रखना होगा कि आतंकवाद केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक सद्भाव और आर्थिक विकास से जुड़ा प्रश्न है. किसी भी प्रकार की राजनीतिक या वैचारिक सहानुभूति आतंकवाद के लिए स्थान नहीं छोड़ सकती. लोकतंत्र में मतभेदों की पूरी गुंजाइश है, लेकिन हिंसा और आतंक को किसी भी परिस्थिति में वैधता नहीं दी जा सकती.
आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी उतना ही आवश्यक है. भारत लंबे समय से उन देशों और संस्थाओं पर दबाव बनाता रहा है, जो आतंकवाद को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संरक्षण देते हैं. वैश्विक मंचों पर भारत की सक्रिय कूटनीति का परिणाम है कि आज अनेक देशों ने आतंकवाद के खिलाफ साझा कार्रवाई की आवश्यकता को स्वीकार किया है. फिर भी, जब तक आतंकवाद को राजनीतिक हितों का साधन बनाने की प्रवृत्ति समाप्त नहीं होगी, तब तक यह खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होगा.
एनआईए की ताजा कार्रवाई का महत्व केवल 23 आतंकियों को सूचीबद्ध करने तक सीमित नहीं है. इसका संदेश उन सभी तत्वों के लिए है, जो देश की शांति और सुरक्षा के खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं. ऐसे लोगों को यह स्पष्ट संकेत मिलना चाहिए कि कानून की पहुंच से कोई भी बाहर नहीं है और आतंकवाद से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को उसके अपराधों का परिणाम भुगतना होगा.
आतंकवाद के विरुद्ध यह संघर्ष लंबा और सतत है. इसमें सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता, सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता और नागरिकों का सहयोग समान रूप से आवश्यक है. भारत को इसी समन्वित दृष्टिकोण के साथ आगे बढऩा होगा, ताकि आतंकवाद की हर जड़ को समाप्त कर सुरक्षित, शांतिपूर्ण और सशक्त राष्ट्र का निर्माण किया जा सके.
