नयी दिल्ली, 03 जुलाई (वार्ता) तृणमूल कांग्रेस ने शुक्रवार को राजनीतिक कार्यकर्ता सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी को एक साल के लिए मुंबई से बाहर निकालने का आदेश को रद्द करने के बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश माधव जामदार के फ़ैसले स्वागत किया है।
तृणमूल ने इस फ़ैसले को संवैधानिक आज़ादी और न्यायपालिका की आज़ादी की मज़बूत पुष्टि बताया। तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने इस मामले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने (न्यायाधीश चौधरी) संविधान की रक्षा की। यह ऐसे समय में हुआ है जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की लगातार कड़ी जाँच-पड़ताल हो रही है।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर कहा, “जब चुप रहना आसान हो, तब बोलने के लिए हिम्मत की आवश्यता होती है। संवैधानिक आज़ादी के साथ खड़े रहने और हमें यह याद दिलाने के लिए न्यायाधीश माधव जामदार को सलाम। उन्होंने हमें समझाया कि न्यायिक आज़ादी का असल मतलब क्या है।”
श्री बनर्जी ने हालाँकि सीधे तौर पर बॉम्बे उच्च न्यायालय के फ़ैसले का ज़िक्र नहीं किया है, लेकिन उनकी यह टिप्पणी न्यायाधीश जामदार द्वारा मुंबई पुलिस के उस आदेश को पलटने के एक दिन बाद आई, जिसमें श्री चौधरी को केंद्र सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के कारण एक साल तक मुंबई में घुसने से रोक दिया गया था।
दो जुलाई का यह फ़ैसला नागरिक आज़ादी, असहमति और न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका पर राष्ट्रीय बहस का एक अहम मुद्दा बन गया है। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश जामदार ने पुलिस की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की और ज़ोर देकर कहा कि नागरिक ‘सरकार के गुलाम’ नहीं हैं। उन्होंने कानून लागू करने वाली एजेंसियों को याद दिलाया कि उनकी जवाबदेही संविधान के प्रति है, न कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री जैसे राजनीतिक नेताओं के प्रति।
न्यायाधीश जामदार के फ़ैसले में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन, सार्वजनिक प्रदर्शन और सरकारी नीतियों के ख़िलाफ़ नारे लगाना संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत सुरक्षित हैं। न्यायालय ने कहा कि लोकतांत्रिक विरोध में सिर्फ़ शामिल होने के आधार पर किसी नागरिक की व्यक्तिगत आज़ादी को ‘एक्सटर्नमेंट’ (राज्य से बाहर निकालने) की शक्तियों के ज़रिए सीमित करना सही नहीं ठहराया जा सकता।
फ़ैसले में इस बात पर भी सवाल उठाया गया कि मुंबई पुलिस ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), ज्ञानवापी मस्जिद विवाद और ईंधन की बढ़ती कीमतों जैसे मुद्दों पर विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने के लिए श्री चौधरी के ख़िलाफ़ ‘एक्सटर्नमेंट’ के प्रावधानों का इस्तेमाल कैसे किया। आदेश को रद्द करते हुए, अदालत ने फिर से कहा कि सरकारी नीतियों के ख़िलाफ़ असहमति लोकतांत्रिक शासन का एक अहम हिस्सा है और इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
श्री बनर्जी का बयान तृणमूल कांग्रेस के उस लगातार रुख़ को दिखाता है कि संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक दखल से दूर, आज़ाद तौर पर काम करना चाहिए। भारतीय राजनीतिक चर्चा में न्यायिक आज़ादी का मुद्दा तेज़ी से अहम होता जा रहा है। कई विपक्षी पार्टियाँ लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज को लेकर चिंता जता रही हैं और ज़्यादा स्वायत्तता की मांग कर रही हैं।
संवैधानिक अदालतों ने बार-बार मौलिक अधिकारों की रक्षा करने और यह पक्का करने की अपनी ज़िम्मेदारी दोहरायी है कि कार्यकारी कार्रवाई संवैधानिक मानकों के अनुरूप हो। इस संदर्भ में न्यायाधीश जामदार की टिप्पणियों की गूंज न्यायालय कक्ष से बाहर भी सुनाई दी है, जिससे संवैधानिक आज़ादी के रक्षक के तौर पर न्यायपालिका की भूमिका रेखांकित होती है।
