महंगाई की बढ़ती रफ्तार पर लगे लगाम

बरसों तक नियंत्रण में रहने के बाद खुदरा महंगाई का फिर रफ्तार पकडऩा चिंता का विषय है. जुलाई में खुदरा महंगाई बढक़र 4.45 प्रतिशत पहुंच गई, जो पिछले कई महीनों का उच्च स्तर है. खाद्य महंगाई भी बढ़ी है. भले ही महंगाई अभी रिजर्व बैंक की सहनशील सीमा छह प्रतिशत से नीचे हो, लेकिन आम आदमी के लिए आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें उसकी आय की तुलना में कितनी तेजी से बढ़ रही हैं.

महंगाई का असर हर परिवार पर समान नहीं पड़ता. जिस परिवार की आय का बड़ा हिस्सा भोजन, किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और बिजली जैसे जरूरी खर्चों में चला जाता है, उसके लिए कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी बजट को बिगाड़ देती है. इसलिए महंगाई दर चार या पांच प्रतिशत होने का अर्थ यह नहीं कि आम परिवार पर उसका असर भी उतना ही सीमित है. खासकर मध्यवर्ग के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य का लगातार महंगा होना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. वैश्विक परिस्थितियों ने भी मुश्किल बढ़ाई है. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर पैदा हुए तनाव से कच्चे तेल के बाजार में अस्थिरता बढ़ी है. दरअसल,भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर उसका सीधा असर परिवहन लागत और अंतत: लगभग हर वस्तु की कीमत पर पड़ता है. सरकार को इस संभावित दबाव से निपटने के लिए अभी से रणनीति बनानी होगी. बहरहाल,महंगाई रोकने के लिए केवल ब्याज दरों या मौद्रिक नीति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा. केंद्र और राज्य सरकारों को जमाखोरी तथा कालाबाजारी पर सख्ती करनी होगी. खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना, बिचौलियों की भूमिका कम करना और किसानों से उपभोक्ताओं तक उत्पाद पहुंचाने की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना जरूरी है. दाल, खाद्य तेल, सब्जियों और अन्य आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन तथा भंडारण की ठोस रणनीति बनानी होगी.

सरकार को पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों के मामले में भी संतुलित नीति अपनानी होगी. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढऩे का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर डालने के बजाय करों और अन्य उपायों के माध्यम से अस्थायी राहत देने पर विचार किया जा सकता है. साथ ही, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना दीर्घकालिक समाधान है. सबसे महत्वपूर्ण सवाल आय और रोजगार का है. यदि आर्थिक विकास की दर अच्छी होने के बावजूद आम आदमी की आय उसी गति से नहीं बढ़ती, तो विकास का लाभ अधूरा रह जाता है. सरकार को रोजगार सृजन, छोटे कारोबारों को प्रोत्साहन, कौशल विकास और मजदूरी बढ़ाने वाली उत्पादक अर्थव्यवस्था पर ध्यान देना होगा. मुफ्त सुविधाओं का दायरा बढ़ाना स्थायी समाधान नहीं है. जरूरत ऐसी अर्थव्यवस्था बनाने की है, जिसमें गरीब और मध्यवर्ग अपनी आय से बढ़ती कीमतों का मुकाबला कर सकें.

महंगाई पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो यह केवल आर्थिक समस्या नहीं रहेगी, बल्कि घरेलू बचत, उपभोग और सामाजिक संतुलन को भी प्रभावित करेगी. सरकार को आंकड़ों में राहत के बजाय आम परिवार की वास्तविक परेशानी को केंद्र में रखकर नीतियां बनानी होंगी. मजबूत आपूर्ति व्यवस्था, नियंत्रित कीमतें, बढ़ते रोजगार और आय में वृद्धि ही महंगाई के खिलाफ सबसे टिकाऊ कवच हो सकते हैं.

 

 

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