राष्ट्रीय शिक्षा नीति से संस्कृति को उच्च शिक्षा तक लाने का अवसर-राज्यपाल पटेल 

उज्जैन। राज्यपाल एवं कुलाधिपति मंगुभाई पटेल की अध्यक्षता में मंगलवार को महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय का छठवां दीक्षांत समारोह कालिदास संस्कृत अकादमी के पंडित सूर्यनारायण व्यास संकुल सभागार में आयोजित किया गया। समारोह में विद्यार्थियों को उपाधियां और पदक प्रदान किए गए।

राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने उपाधि प्राप्त विद्यार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि वे अपने जीवन में ज्ञान, अनुशासन और संस्कारों का पालन करें। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने देश को अपनी जड़ों की ओर लौटने का अवसर प्रदान किया है। हमारी संस्कृति और परंपराओं को उच्च शिक्षा से जोडऩे का यह महत्वपूर्ण अवसर है। विश्वविद्यालयों को संस्कृत की वैश्विक पहचान स्थापित करने के लिए कार्य करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत प्राचीन काल से ही ज्ञान और शिक्षा का विश्व केंद्र रहा है। एक समय विदेशों से विद्यार्थी भारत में शिक्षा ग्रहण करने आते थे, जबकि आज हमारे विद्यार्थी विदेशों की ओर जा रहे हैं। विकसित भारत-2047 के लक्ष्य के साथ ऐसा भारत निर्मित होगा, जहां युवाओं को शिक्षा के लिए विदेश जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। उन्होंने कहा कि आज समाज में चरित्र निर्माण की सबसे अधिक आवश्यकता है। पुराने विचारों, संस्कारों और संस्कृति को विकसित कर ही विकसित भारत का निर्माण संभव है। शिक्षा जगत पर समाज और राष्ट्र की बड़ी जिम्मेदारी है तथा विद्यार्थियों को भारत को पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। संस्कृत और भारतीय परंपराओं का ज्ञान वर्तमान पीढ़ी के लिए आवश्यक है, क्योंकि संस्कृति का संरक्षण अच्छे संस्कारों से ही संभव है।

दीक्षांत समारोह में उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार, स्वामी गोविंददेव गिरि महाराज, सांसद अनिल फिरोजिया, राज्यसभा सांसद बालयोगी संत उमेशनाथ महाराज, विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा उपस्थित थे। समारोह के सारस्वत अतिथि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति श्रीनिवास वरखेड़ी तथा सम्मानित अतिथि लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलगुरु प्रो. रमेश कुमार पांडे रहे। शुरुआत समूह छायाचित्र और अकादमिक शोभायात्रा से हुई। राष्ट्रगान और विश्वविद्यालय कुलगान के बाद अतिथियों ने मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कुलगुरु प्रो. मिश्र ने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों और भावी योजनाओं की जानकारी दी।

 

उच्च शिक्षा मंत्री ने भी दिया उद्बोधन-डि-लीट की मानद उपाधि

उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि उपाधि प्राप्त विद्यार्थी भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं और भारतीय संस्कृति को विश्व पटल पर स्थापित करें। इस अवसर पर राज्यपाल एवं अन्य अतिथियों ने विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित विभिन्न पुस्तकों का विमोचन किया। स्वामी गोविंददेव गिरि महाराज को संस्कृत भाषा, साहित्य, धर्म एवं राष्ट्रधर्म के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय द्वारा महामहोपाध्याय (डी.लिट.) की मानद उपाधि प्रदान की गई। वहीं लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. रमेश कुमार पांडे को संस्कृत भाषा एवं साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए विद्यावाचस्पति (डी.लिट.) की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। दीक्षांत समारोह में 21 पीएचडी सहित कुल 1303 उपाधियां प्रदान की गईं। इसके अलावा 42 विद्यार्थियों को पदक प्रदान किए गए, जिनमें 16 स्वर्ण, 13 रजत और 13 कांस्य पदक शामिल हैं। समारोह में विश्वविद्यालय की कार्य परिषद के सदस्य गौरव धाकड़, डॉ. विश्वास व्यास, डॉ. हरीश व्यास, एडवोकेट गीतांजलि चौरसिया, डॉ. केशर सिंह चौहान सहित विश्वविद्यालय के सभी संकायाध्यक्ष उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. उपेंद्र भार्गव ने तथा आभार प्रदर्शन कुलसचिव डॉ. दिलीप सोनी ने किया।

 

परंपरा का ज्ञान देना जरूरी

 

राज्यपाल ने कहा कि हम संस्कृति और संस्कारों की बात तो करते हैं, लेकिन नई पीढ़ी को रामायण, श्रीमद् भगवद् गीता और भारतीय परंपराओं का ज्ञान नहीं दे पा रहे हैं। बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव भी सिखाना आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों से अपने माता-पिता का सम्मान करने का आह्वान करते हुए कहा कि सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी माता-पिता के त्याग और संघर्ष को कभी नहीं भूलना चाहिए।

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