किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा शक्ति होती है. वही शक्ति यदि नशे की गिरफ्त में आने लगे तो यह केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र निर्माण के लिए गंभीर चुनौती बन जाती है. शुक्रवार को मनाए गए अंतरराष्ट्रीय नशा एवं मादक पदार्थ निषेध दिवस के अवसर पर यह स्वीकार करने की आवश्यकता है कि भारत, विशेषकर पंजाब जैसे राज्यों में नशे का बढ़ता जाल चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुका है.
नशा अब केवल व्यक्तिगत लत नहीं रह गया है. इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय तस्करी, संगठित अपराध, गैंगस्टर नेटवर्क और आतंकवादी गतिविधियों तक की कडिय़ां जुड़ी हुई हैं. आसान कमाई का लालच, बेरोजगारी, गलत संगत, मानसिक तनाव और सोशल मीडिया के माध्यम से अपराधियों की बढ़ती पहुंच युवाओं को इस दलदल में धकेल रही है. पहले नशे का सेवन, फिर तस्करी और अंतत: अपराध की दुनिया में प्रवेश का यह सिलसिला समाज के लिए गंभीर खतरा बन चुका है.
चिंता की बात यह है कि नशे का दुष्प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता. इससे परिवार टूटते हैं, शिक्षा प्रभावित होती है, अपराध बढ़ते हैं और समाज में असुरक्षा का वातावरण बनता है. एक नशेड़ी युवा केवल अपना भविष्य नहीं खोता, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदों को भी समाप्त कर देता है. इसलिए इस समस्या को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानना पर्याप्त नहीं होगा.
सरकार की जिम्मेदारी यहां सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है. सीमाओं पर मादक पदार्थों की तस्करी रोकने के लिए आधुनिक तकनीक, खुफिया तंत्र और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है. नशा बेचने वाले बड़े गिरोहों और उनके आर्थिक नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए. केवल छोटे तस्करों की गिरफ्तारी से समस्या का समाधान नहीं होगा. इस अवैध कारोबार की पूरी श्रृंखला को तोडऩा होगा.
साथ ही, नशे के शिकार युवाओं को अपराधी नहीं बल्कि उपचार और पुनर्वास की आवश्यकता वाले नागरिक के रूप में भी देखना होगा. प्रत्येक जिले में प्रभावी नशा मुक्ति केंद्र, मनोवैज्ञानिक परामर्श, कौशल विकास और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए. जो युवा मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं, उन्हें दूसरा अवसर मिलना ही चाहिए.
लेकिन केवल सरकार के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे. परिवारों, शिक्षण संस्थानों, धार्मिक संगठनों और समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी. माता-पिता को बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए. स्कूलों और कॉलेजों में नियमित जागरूकता अभियान, खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों और व्यक्तित्व विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा देना होगा, ताकि युवाओं की ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लग सके.
नशे के विरुद्ध लड़ाई केवल पुलिस की नहीं, पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है. यदि आज हमने अपनी युवा पीढ़ी को इस दलदल से बाहर निकालने में सफलता प्राप्त कर ली, तो वही युवा भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की सबसे बड़ी शक्ति बनेंगे. राष्ट्रनिर्माण का मार्ग नशे से नहीं, शिक्षा, रोजगार, संस्कार और अवसरों से होकर गुजरता है. अब समय आ गया है कि नशे के खिलाफ अभियान को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि जन आंदोलन बनाया जाए. तभी भारत अपनी युवा शक्ति को सुरक्षित रख सकेगा और भविष्य का मजबूत राष्ट्र बन सकेगा.
