कांग्रेस के उपवास में भी नजर आई गुटबाजी

विंध्य की डायरी

डॉ रवि तिवारी

कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान और प्रशिक्षण शिविर से एक उम्मीद जगी थी कि कांग्रेस अब अपना खोया सम्मान वापस लाकर रहेगी. साथ ही आगामी चुनावों में कांग्रेस विजय ध्वज फहरा सकेगी पर जो तस्वीर सामने है उससे नही लगता कि गुटबाजी और छत्रपों की राजनीति से पार्टी बाहर निकल पाएगी. हाल ही में राज्यसभा प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त हुआ जिसके विरोध में कांग्रेस आक्रामक हो गई और आर-पार की लड़ाई शुरू कर दी. प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन और उपवास कार्यक्रम रखे गये लोकतंत्र को बचाने के लिये.

इस उपवास में भी कांग्रेसी एक नही हो पाए. समूचे विंध्य में आपसी गुटबाजी देखने को मिली, कई जिम्मेदार नेता उपवास में नजर नही आए. दूसरे शब्दों में यह कहें कि खुद को अलग रखा. कई ऐसे प्रमुख चेहरे थे जो धरना उपवास में शामिल नही हुए. किसी ने कहा कि शहर से बाहर है लेकिन कई चेहरे ऐसे थे जो शहर में होने के बावजूद उपवास धरने में नही पहुंचे. इससे साफ है कि कांग्रेस की गुटबाजी अभी भी अपने स्थान पर है और छत्रपों के इर्दगिर्द ही राजनीति की धुरी घूम रही है. ऐसे हालात में क्या कांग्रेस फिर से विंध्य को अपना गढ़ बना पाएगी? संगठनात्मक ढ़ांचा पहले से ही बेहद कमजोर है और गुटबाजी अंदर ही अंदर पार्टी को दीमक की तरह खोखला कर रही है.

आखिर कौन हैं बड़े साहब

सरकारी अफसरों और विशिष्ट अतिथियों के ठहरने के लिये बनाए गये नवीन सर्किट हाउस की व्यवस्थाओं और उपयोग को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े होने लगे है. नियमों और प्रोटोकाल की अनदेखी हो रही है. पुराने सर्किट हाउस में बाबा कांड ने सभी को हिला कर रख दिया था. कहावत है कि दूध की जली बिल्ली छाछ भी फूंक-फूंक कर पीती है पर ऐसा प्रतीत होता है कि जिम्मेदार तंत्र ने अतीत की घटनाओं से कोई सबक नही लिया है. कभी भी किसी के लिये सर्किट हाउस के दरवाजे खोल दिये जाते है. इस समय यहां बीमा कम्पनी से जुड़े एक व्यक्ति के भोपाल से आकर ठहरने की चर्चा है. रीवा आने पर सर्किट हाउस में ठहरने का इंतजाम कराया जाता है. चर्चा है कि एक बड़े अफसर की सिफारिश पर इन साहब को सर्किट हाउस में कोई न कोई रूम आवंटित हो जाता है. आखिरकार कौन है बड़े साहब? जिनके लिये नियम दरकिनार कर दिया जाता है. प्रशासनिक गलियारे में इस समय खूब चर्चा है. बड़े साहब कौन है जिनकी सिफारिश पर कमरा मिलता है ? यह जांच का विषय है.

सत्ता-संगठन में तालमेल नहीं

इस समय प्रदेश भर में अधिकारियों और कर्मचारियों के लिये स्थानान्तरण का द्वार खोल दिया गया है. मनचाहे स्थान पर पदस्थापना पाने के लिये हर कोई प्रयासरत है और सत्ता-संगठन की गणेश परिक्रमा करने में लगा है. दरअसल स्थानान्तरण को लेकर सत्ता और संगठन के बीच तालमेल नही बन पा रहा है, जिसके कारण सूचियां लटकी हुई है . तीन साल से एक ही थाने में जमे प्रभारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा, ऐसा आदेश प्रदेश पुलिस के मुखिया ने जारी किया था. मजे की बात तो यह है कि एक ही थाने और अनुभाग में पिछले कई वर्षो से थाना प्रभारी जमे हुए है. जैसे ऊर्जाधानी के मोरवा, बैढऩ कोतवाली, चितरंगी, जियावन के अलावा विंध्य के अन्य जिलों में एक ही थाने पर और एक ही जिले में दस वर्ष से अधिक समय से पुलिसकर्मी ड़टे हैं , मजाल है कि उन्हे हटा दिया जाय. हर कोई अपनी सेटिंग करके बैठा है. तो क्या यह माना जाय कि डीजी साहब का आदेश केवल कागजों तक सीमित है, आखिर अमली जामा कब पहनाया जाएगा.

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