एथेनॉल; सभी शंकाओं का समाधान करे सरकार

पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण भारत की ऊर्जा नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है. सरकार ने वर्ष 2025-26 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (ई-20) का लक्ष्य हासिल करने का दावा किया है. संसद में भी सरकार ने स्पष्ट किया है कि व्यापक वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद ही इस नीति को लागू किया गया है और अब तक ई-20 के कारण इंजनों को किसी प्रकार के नुकसान का प्रमाण नहीं मिला है. फिर भी देश के एक बड़े वर्ग में एथेनॉल को लेकर अनेक आशंकाएं बनी हुई हैं. सरकार का दायित्व केवल नीति बनाना नहीं, बल्कि उससे जुड़े हर संदेह का तथ्यात्मक और पारदर्शी समाधान भी करना है.

सबसे बड़ी चिंता वाहन मालिकों की है. जिन लोगों के पास पुराने मॉडल की गाडिय़ां हैं, वे यह जानना चाहते हैं कि ई-20 ईंधन उनके इंजन, माइलेज और रखरखाव पर क्या प्रभाव डालेगा. सोमवार को संसद में सरकार ने स्वीकार किया कि ई-20 समर्थित वाहनों की सटीक संख्या का अनुमान उपलब्ध नहीं है, लेकिन परीक्षणों के आधार पर इंजन को किसी गंभीर नुकसान से इनकार किया गया है. यदि कुछ परिस्थितियों में माइलेज में मामूली कमी आ सकती है, तो सरकार को यह बात भी स्पष्ट रूप से बतानी चाहिए. आधी-अधूरी जानकारी ही अफवाहों और भ्रम को जन्म देती है.

एथेनॉल नीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू कृषि से जुड़ा है. एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने, मक्का तथा अन्य कृषि उत्पादों से होता है. इससे किसानों को अपनी उपज का अतिरिक्त बाजार मिलता है, चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति मजबूत होती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है. विशेष रूप से मक्का उत्पादन बढ़ाने वाले राज्यों के किसानों के लिए यह आय बढ़ाने का अवसर बन सकता है.

लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर प्रश्न भी जुड़े हैं. यदि एथेनॉल उत्पादन के लिए खाद्यान्न फसलों का अत्यधिक उपयोग होने लगे, तो खाद्य सुरक्षा, फसल विविधता और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है. गन्ना पहले से ही अत्यधिक पानी की मांग वाली फसल है. ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि एथेनॉल नीति खाद्यान्न उत्पादन और पर्यावरणीय संतुलन की कीमत पर आगे नहीं बढ़ेगी. सरकार को यह भी बताना चाहिए कि भविष्य में कृषि अवशेषों, दूसरी पीढ़ी (2जी) के एथेनॉल तथा गैर-खाद्य जैव संसाधनों को कितना महत्व दिया जाएगा.

मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में एथेनॉल संयंत्रों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और सरकार इनके लिए बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन भी दे रही है. यह निवेश रोजगार, उद्योग और ग्रामीण विकास के लिए सकारात्मक हो सकता है, लेकिन इसके आर्थिक, पर्यावरणीय और कृषि संबंधी प्रभावों का नियमित सार्वजनिक मूल्यांकन भी उतना ही आवश्यक है.

भारत को आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करनी है, कार्बन उत्सर्जन घटाना है और किसानों की आय बढ़ानी है. एथेनॉल इन तीनों लक्ष्यों की दिशा में उपयोगी माध्यम बन सकता है. लेकिन किसी भी बड़ी नीति की सफलता केवल उसके उद्देश्यों से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से तय होती है. इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार व्यापक जन जागरूकता अभियान चलाए, सभी वैज्ञानिक अध्ययन सार्वजनिक करे और वाहन मालिकों, किसानों तथा विशेषज्ञों के हर प्रश्न का स्पष्ट उत्तर दे. एथेनॉल पर जितनी पारदर्शिता होगी, उतना ही इस महत्वाकांक्षी नीति को समाज का व्यापक समर्थन मिलेगा.

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