ब्रिक्स ; भारत के लिए अवसरों का बड़ा मौका

नई दिल्ली में शनिवार से हो रहा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया की पुरानी भू-राजनीतिक धुरी तेजी से बदल रही है. रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संकट, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, व्यापार युद्ध और आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव ने वैश्विक व्यवस्था को अस्थिर किया है. ऐसे दौर में रूस, चीन, ईरान समेत प्रमुख उभरती शक्तियों का एक मंच पर आना महज कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है. यह इस बात का संकेत है कि वैश्विक शक्ति संतुलन अब बहुध्रुवीय दिशा में बढ़ रहा है और ग्लोबल साउथ अपनी भूमिका अधिक मजबूती से दर्ज करा रहा है.

भारत के लिए इस सम्मेलन का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है, क्योंकि वह ब्रिक्स में केवल एक सदस्य नहीं, बल्कि इस बदलती व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण केंद्र है. भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी रणनीतिक स्वायत्तता है. अमेरिका और यूरोप से गहरे संबंध रखते हुए भारत रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा सहयोग जारी रखता है, चीन के साथ मतभेदों के बावजूद संवाद बनाए रखता है और पश्चिम एशिया के देशों के साथ आर्थिक रिश्ते मजबूत कर रहा है. यही संतुलन भारत को ब्रिक्स में प्रभावी भूमिका निभाने की क्षमता देता है.

लेकिन इस सम्मेलन का असली मूल्य भारत के लिए उसकी ठोस आर्थिक और रणनीतिक उपलब्धियों में है. सबसे पहले, ब्रिक्स के विस्तारित बाजार भारतीय निर्यात के लिए नए अवसर खोल सकते हैं. दवाइयां, कृषि उत्पाद, ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स और डिजिटल सेवाओं के लिए इन देशों में बड़ा बाजार मौजूद है. यदि व्यापारिक बाधाएं कम होती हैं तो भारतीय कंपनियों को पश्चिमी बाजारों पर अत्यधिक निर्भरता घटाने का अवसर मिलेगा.दूसरा बड़ा लाभ ऊर्जा सुरक्षा का है. रूस और पश्चिम एशिया के प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों के साथ भारत के संबंधों को ब्रिक्स के मंच से नई मजबूती मिल सकती है. सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति भारत की अर्थव्यवस्था, उद्योग और महंगाई,तीनों के लिए महत्वपूर्ण है. ऊर्जा आयात के भुगतान और दीर्घकालीन आपूर्ति समझौतों में बेहतर व्यवस्था भारत के हित में होगी.तीसरा लाभ वित्तीय क्षेत्र में है. स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार भुगतान व्यवस्था विकसित होती है तो भारत को डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता से कुछ राहत मिल सकती है. इससे भुगतान लागत घटाने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को अधिक सुगम बनाने में मदद मिलेगी. हालांकि डॉलर से पूरी तरह अलग होने की बात अभी व्यावहारिक नहीं है, लेकिन वैकल्पिक भुगतान तंत्र भारत की रणनीतिक सुरक्षा जरूर बढ़ाएंगे.चौथा महत्वपूर्ण क्षेत्र निवेश और तकनीक है. न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से बुनियादी ढांचे, हरित ऊर्जा और विकास परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध हो सकता है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में सहयोग भारत की तकनीकी क्षमता को विस्तार दे सकता है. वैश्विक कंपनियों के लिए चीन के विकल्प के रूप में भारत को उभरने में भी ब्रिक्स सहयोग मददगार हो सकता है.जाहिर है सबसे बड़ा लाभ कूटनीतिक है. एक ही मेज पर रूस, चीन, ईरान और अन्य प्रभावशाली देशों को लाने की भारत की क्षमता उसकी वैश्विक साख बढ़ाती है. भारत यदि अपने आर्थिक हितों को आगे बढ़ाते हुए विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच संतुलन बनाए रखता है, तो ब्रिक्स उसके लिए केवल एक संगठन नहीं, बल्कि व्यापार, ऊर्जा, निवेश और रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने का महत्वपूर्ण मंच साबित हो सकता है. नई दिल्ली सम्मेलन की सफलता इसी में होगी कि भारत घोषणाओं से आगे बढक़र इन अवसरों को ठोस परिणामों में बदल पाए.

 

 

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