दुर्गापुर, (वार्ता) स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने और गांवों को शून्य-कचरा वाले बनाने की दिशा में पहल करते हुए पश्चिम बंगाल के पंचायत विभाग ने यहां स्थित वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की एक प्रयोगशाला के साथ हाथ मिलाया है। शुक्रवार को आयोजित एक कार्यशाला में पंचायत विभाग के अधिकारियों और दक्षिण बंगाल की 14 जिला परिषदों के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया।
केंद्रीय यांत्रिक अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (सीएमईआरआई) के निदेशक डॉ. नरेश चंद्र मुर्मु और पश्चिम बर्दवान जिला परिषद की उप सचिव अबिदा सुल्ताना की अध्यक्षता में आयोजित हुई इस कार्यशाला में विभिन्न जिलों के प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार के गोबरधन मिशन को गांवों तक पहुंचाने के तरीकों पर चर्चा की।
डॉ. मुर्मु ने कहा, “बढ़ती एलपीजी की कीमतों से निपटने और स्वच्छ ऊर्जा के लाभ हासिल करने के लिए संबंधित जिला परिषदों ने घरेलू उपयोग में बायोगैस के इस्तेमाल पर अधिक जोर देने का संकल्प लिया है।”
उन्होंने कहा, “तकनीक हस्तांतरण के अलावा हमने तकनीक के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर भी विशेष जोर देने का सुझाव दिया है।” सीएमईआरआई की तकनीक में बायोगैस बनाने के लिए मुख्य सामग्री के रूप में गोबर का इस्तेमाल किया जाता है। सीएमईआरआई ने खुद केंद्रीय प्रयोगशाला की प्रमुख परियोजना आईएमएसडब्ल्यूडीएस यानी एकीकृत नगरपालिका ठोस अपशिष्ट निपटान प्रणाली के तहत एक बायोगैस संयंत्र स्थापित किया है। 250 परिवारों वाली इसकी कॉलोनी में स्थापित यह तीन-इन-वन परियोजना अब बंगाल की पहली शून्य-कचरा कॉलोनी बन गयी है।
यह प्रणाली हर घंटे 100 किलोग्राम कचरे को मशीन के जरिए अलग-अलग करती है, खाना पकाने और बिजली बनाने के लिए प्रतिदिन 20 घन मीटर बायोगैस तैयार करती है और बचे हुए घोल से ब्रिकेट बनाती है। इससे एलपीजी की खपत कम होती है।
अधिकारियों ने बताया कि प्रयोगशाला ने 21 जिलों में भी बायोगैस संयंत्र स्थापित किए हैं। अधिकारियों ने कहा कि इस तरह की परियोजनाएं होटल, बाजार और आवासीय सोसायटियों के लिए भी उपयुक्त हैं।
पंचायत विभाग की उप सचिव सुल्ताना ने कहा, “स्वच्छ भारत के गोबरधन मिशन के तहत गोबर और रसोई के कचरे को बायोगैस और जैविक खाद में बदला जा रहा है। इससे ऊर्जा, अधिक स्वच्छ गांव और ग्रामीण रोजगार पैदा हो रहे हैं।”
प्राप्त जानकारी के अनुसार सीएमईआरआई मध्यम शुल्क लेकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को यह तकनीक उपलब्ध कराता है। वहीं, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय से वित्त पोषित एक अन्य परियोजना पर काम चल रहा है, जिसका उद्देश्य मीथेन की मात्रा बढ़ाना और हरित ऊर्जा से जुड़ी पहलों को तेजी से आगे बढ़ाने में मदद करना है।
प्रयोगशाला ने कुछ वर्ष पहले ही बायोगैस उत्पादन के लिए अवायवीय डाइजेस्टर विकसित कर लिए थे।
