पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के 100 दिन पूरे हो चुके हैं, लेकिन यह संघर्ष अब केवल अमेरिका, इजराइल और ईरान तक सीमित नहीं रह गया है. इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और आम लोगों के जीवन पर साफ दिखाई दे रहा है. विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुमानों के अनुसार इस युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 474 लाख करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाया है. यह आंकड़ा बताता है कि किसी क्षेत्रीय संघर्ष की कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ती है.
युद्ध का सबसे बड़ा प्रभाव होर्मुज जलडमरूमध्य पर पड़ा है, जहां से दुनिया के तेल और गैस व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है. इस मार्ग में आई बाधाओं ने ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर दिया है. पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी का असर 146 देशों तक पहुंचा है. इसका परिणाम महंगाई, उत्पादन लागत में वृद्धि और आर्थिक विकास की रफ्तार में कमी के रूप में सामने आ रहा है. विकासशील देशों के लिए यह स्थिति और भी कठिन है, क्योंकि वे पहले से ही आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.
युद्ध केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है. हजारों लोगों की मौत, लाखों घायलों और लाखों विस्थापित नागरिकों की त्रासदी इस संघर्ष की सबसे दर्दनाक तस्वीर है. युद्ध के मैदान से दूर रहने वाले देशों के नागरिक भी बढ़ती महंगाई, महंगे हवाई किराए, अस्थिर बाजार और कमजोर होती अर्थव्यवस्था के रूप में इसकी कीमत चुका रहे हैं.
इस संकट का सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि सभी पक्ष अपनी-अपनी जिद पर अड़े हुए दिखाई देते हैं. अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कठोर शर्तें थोपना चाहता है, जबकि ईरान अपने रणनीतिक हितों से पीछे हटने को तैयार नहीं है. इजराइल अपनी सुरक्षा चिंताओं को सर्वोच्च प्राथमिकता मानते हुए सैन्य दबाव बनाए रखना चाहता है. इस टकराव में संवाद की संभावनाएं बार-बार कमजोर पड़ रही हैं.
आज आवश्यकता इस बात की है कि अमेरिका, इजराइल और ईरान तीनों अपनी जिद छोड़ें और स्थायी शांति की दिशा में गंभीर पहल करें. सैन्य शक्ति किसी भी पक्ष को अस्थायी बढ़त दे सकती है, लेकिन स्थायी समाधान केवल बातचीत और कूटनीति से ही निकल सकता है. यदि होर्मुज मार्ग पर तनाव बना रहता है, ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है और क्षेत्रीय संघर्ष का दायरा बढ़ता है, तो इसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ेगा.
इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी भी अंतिम समाधान नहीं बनता. अंतत: सभी पक्षों को वार्ता की मेज पर लौटना ही पड़ता है. सवाल यह है कि क्या यह वापसी हजारों और जानें जाने तथा खरबों रुपए की अतिरिक्त आर्थिक क्षति के बाद होगी, या फिर समय रहते समझदारी दिखाई जाएगी.
दुनिया पहले ही इबोला महामारी, आर्थिक अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही है. ऐसे समय में पश्चिम एशिया का यह युद्ध वैश्विक शांति और समृद्धि के लिए गंभीर खतरा बन गया है. इसलिए अब यह केवल क्षेत्रीय राजनीति का विषय नहीं रहा, बल्कि पूरी मानवता के हित का प्रश्न है. अमेरिका, इजराइल और ईरान को अपनी जिद छोडक़र शांति का रास्ता अपनाना चाहिए, क्योंकि युद्ध में किसी एक की हार या जीत नहीं होती, हार अंतत: पूरी दुनिया की होती है.
