उजड़ रहा है भोपाल का मोर वन जहां कभी गूंजती थी मोरों की आवाज, वहां अब पसरा है सन्नाटा

आशीष कुर्ल

भोपाल। बढ़ती गर्मी और लू का असर केवल इंसानों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जंगलों, वन्यजीवों और शहरी जैव विविधता पर भी इसका गंभीर प्रभाव दिखाई देने लगा है। राजधानी भोपाल के बीचों बीच स्थित मोर वन, जिसे कभी नए भोपाल का “ऑक्सीजन प्लांट” कहा जाता था, आज उपेक्षा और जल संकट के कारण पर्यावरणीय संकट का सामना कर रहा है।

शहर के हरित क्षेत्र में फैला मोर वन कभी बंजर जमीन हुआ करता था, जिसे प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. अजीत सलूजा के प्रयासों से हरे-भरे वन क्षेत्र में बदला गया। स्थानीय लोगों के अनुसार डॉ. सलूजा ने निजी स्तर पर भूमिगत पाइपलाइन बिछवाई थी और वन क्षेत्र में छह स्टॉप डैम बनवाए थे, ताकि पौधों और वन्यजीवों के लिए पानी की व्यवस्था बनी रहे।

करीब 25 वर्षों तक वे प्रतिदिन सुबह स्वयं पौधों को पानी देते रहे और हरियाली को विकसित करते रहे। धीरे-धीरे यह क्षेत्र मोरों, सरीसृपों और कई प्रजातियों के पक्षियों का सुरक्षित आश्रय बन गया। स्थानीय निवासी बताते हैं कि कभी यहां मोरों की आवाजें गूंजती थीं और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच यह वन जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र था।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्थिति तेजी से बिगड़ी है। डॉ. सलूजा का आरोप है कि कैपिटल प्रोजेक्ट प्रशासन (सीपीए) के अधिकारियों ने पाइपलाइन नेटवर्क को अवैध बताते हुए हटवा दिया, जिसके बाद वन क्षेत्र में पानी की भारी कमी हो गई और रखरखाव भी प्रभावित हुआ।

डॉ. सलूजा ने मोरों की घटती संख्या पर चिंता जताते हुए कहा कि पहले यहां बड़ी संख्या में मोरनियां अंडे देती थीं, लेकिन टूटी हुई फेंसिंग के कारण आवारा और जंगली कुत्ते अंदर घुसकर घोंसलों को नष्ट कर देते हैं। उन्होंने कहा कि अब बारिश के मौसम में मोर के बच्चे लगभग दिखाई ही नहीं देते।

स्थानीय निवासी पी.के. द्विवेदी ने आरोप लगाया कि वन संरक्षण में सहयोग देने वाले नागरिकों को भी रोका जा रहा है। वहीं अतुल कुमार बोहरे ने कहा कि पाइपलाइन के माध्यम से पेड़ों को पानी देने वाले स्वयंसेवकों को वन अमले ने रोक दिया, जिससे क्षेत्र का भविष्य संकट में दिखाई दे रहा है। उनका कहना है कि इस भीषण गर्मी में मोर खुले मुंह प्यास से बेहाल नजर आते हैं और उनके लिए पानी की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है।

 

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