नई दिल्ली | पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर केंद्र सरकार ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए राज्यों पर निशाना साधा है। सरकार का तर्क है कि पूरे देश में उत्पाद शुल्क समान होने के बावजूद खुदरा कीमतों में अंतर का मुख्य कारण राज्यों द्वारा लगाया गया मूल्य वर्धित कर (वैट) है। रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे कांग्रेस या विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में वैट और उपकर अधिक होने के कारण ईंधन की कीमतें तुलनात्मक रूप से ज्यादा हैं।
केंद्र सरकार ने हालिया मूल्य वृद्धि का बचाव करते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की अस्थिरता के दौरान भारत ने उपभोक्ताओं को लंबे समय तक राहत प्रदान की थी। सरकार ने दावा किया कि रूस-यूक्रेन संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के दौरान तेल कंपनियों और खजाने ने भारी नुकसान खुद वहन किया। दस्तावेज में बताया गया कि मार्च 2026 में उत्पाद शुल्क में कटौती के बाद से सरकार को करीब 30,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है, ताकि आम जनता पर बोझ न पड़े।
सरकार ने यूपीए सरकार के समय के ‘तेल बांड’ को भी ईंधन की कीमतों में वर्तमान चुनौतियों के लिए जिम्मेदार ठहराया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछली सरकार की देनदारियों का भुगतान वर्तमान प्रशासन कर रहा है, जबकि मौजूदा सरकार सीधे उत्पाद शुल्क में कटौती की नीति अपना रही है। साथ ही, सरकार ने अंतरराष्ट्रीय तुलना करते हुए दावा किया कि अन्य देशों के मुकाबले भारत ने वैश्विक संकटों के बावजूद ईंधन कीमतों में काफी कम वृद्धि की है, जिससे आर्थिक स्थिरता बनी रही।

