आए थे ऊर्जा भरने, देख गए गुटबाजी की झलक….

अविनाश दीक्षित

जब अपने ही भितरघात, आपसी विवाद कर एकजुटता को भंग करते नजर आएं तो फिर विपक्ष या प्रतिद्वंदी की क्या जरूरत है..ये कहावत एक बार फिर से शहर कांग्रेस कमेटी में फिट बैठी है। हूआ यूं कि कांग्रेस के दिग्गज नेता, पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल विगत दिनों शहर पहुंचे, उनसे कार्यकर्ताओं का मेल जोल का सिलसिला शुरू हुआ, इसी दौरान कांग्रेस का एक गुट असंतुष्ट नजर आया। सोशल मीडिया में कुछ ऐसी टिप्पणियां हुईं जिससे पार्टी की एकजुटता फिर सवालिया घेरे में ख़डी दिखी। आलम ये था कि अजय सिंह के जबलपुर दौरे के दौरान गुटबाजी देखकर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और उनके समर्थक भी दूरी बनाते नजर आए। गिने चुने कांग्रेसियों ने आरोप लगाए कि पूर्व नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस के ऐसे नेताओं के घर गए जिनका कोई प्रभाव नहीं हैं और उनके घर नहीं गए जिनका प्रभाव शहर की राजनीति में अधिक है। बस यही बात कांग्रेसियों को खटकी और फिर राजनैतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गईं हुईं। माना जा रहा था कि शहर कांग्रेस में नई ऊर्जा भरने और संगठन को मजबूर करने के उद्देश्य से अजय सिंह राहुल जबलपुर आए थे। उन्होंने क्या आंकलन किया, यह वही जानते हैं, मगर खबर है कि प्रदेश कांग्रेस के आला नेताओं तक जबलपुर कांग्रेस में गुटबाजी की शिकायत फिर से पहुँच गई है। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि संगठन इस गुटबाजी को थामने में सफल होता है या फिर ऐसे ही पार्टी में आंतरिक कलह चलते आगामी विधानसभा, नगर निगम चुनाव में इसके दुष्प्रभाव को झेलेगा। फिलहाल संगठन में जो स्थिति नजर आ रही है उससे तो ये बिल्कुल स्पष्ट नजर आ रहा है कि कांग्रेस से असंतुष्ट नेता ध्यानाकर्षण में ही जुटे हुए हैं। वहीं कांग्रेस के जानकारों का भी मानना है कि जबलपुर कांग्रेस लंबे समय से गुटीय राजनीति का शिकार रही है। शहर और जिला अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद संगठन का पूरा ढांचा बन चुका है तथा संगठन के पदाधिकारियों की लंबी चौड़ी फौज भी बन चुकी है, किन्तु कांग्रेसी कुनबे में कमी सिर्फ एकजुटता की नजर आ रही है।

 

 

जबलपुर के हितों में बार-बार हो रही चोट, जिम्मेदारों क्यों हैं मौन…

 

अतीत में जबलपुर कई संस्थान खो चुका है और हर बार शहर के नागरिक सिर्फ अफसोस ही कर पाए हैं। यदि इस बार भी समय रहते आवाज नहीं उठाई गई तो आने वाली पीढ़ियां इसे शहर की एक और बड़ी चूक के रूप में याद करेंगी। कभी पर्यटन विकास के नाम पर, तो कभी जबलपुर को उपराजधानी बनाने के नाम पर, कभी हवाई सेवा के नाम पर जबलपुर के साथ हमेशा से छलावा होता आ रहा है। अब एक बार फिर संस्कारधानी अपने हक से वंचित होने की कगार पर खड़ी नजर आ रही है। खबर है कि सरकार द्वारा शहर के गौरवपूर्ण पहचान वाली मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी को 3 हिस्सों में बांटने का प्रारंभिक खाका तैयार हो चुका है। यह विषय विभिन्न सूचना माध्यम में सुर्खियां बटोर चुका है, बावजूद इसके शहर के जिम्मेदारों, जनप्रतिनिधियों ने चुप्पी साधी हुई है और ये चुप्पी अब अपने आप में कई सवाल खड़े करती नजर आ रही है। सवाल पूछे जा रहे हैँ कि जब शहर के हितों पर बार बार चोट हो रही है, तब राजनीतिक दलों, मेडिकल एसोसिएशन, कर्मचारी संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और बुद्धिजीवियों की आवाज आखिर कहां दबी है..? हर मुद्दे पर बयान देने वाले कई संगठन इस गंभीर विषय पर अब तक खुलकर सामने क्यों नहीं आए हैं..? उधर जागरूक शहरवासी सोशल मीडिया में ये कहते भी नजर आ रहे हैं कि जब तक जबलपुर में एकजुट आंदोलन नहीं होगा तब तक सरकार ऐसे निर्णयों पर पुनर्विचार नहीं करेगी। विकास का सब्ज़बाग दिखाकर जनता के वोट हासिल करने वाले निर्वाचित जन प्रतिनिधियों से मौन साधना से बाहर निकल कर जबलपुर के हितचिंतन की अपेक्षा की जा रही है। सर्वविदित है कि जबलपुर स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के क्षेत्र को कम करके छिंदवाड़ा में नया विश्वविद्यालय बना दिया गया था और अभी पिछले वर्ष ही जबलपुर वेटरनरी विश्वविद्यालय का विखंडन करके डेयरी साईंस कॉलेज को जबलपुर से उज्जैन स्थानांतरित कर दिया गया था। जानकारों का मानना है कि यदि मेडिकल यूनिवर्सिटी का विखंडन होता है तो इसका प्रशासनिक, शैक्षणिक और आर्थिक असर भी जबलपुर पर पड़ेगा। यूनिवर्सिटी से जुड़े अधिकारी, कर्मचारी, विद्यार्थी, शोध गतिविधियां और अन्य व्यवस्थाएं शहर की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी हैं। ऐसे में इसका विभाजन केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि जबलपुर के भविष्य से जुड़ा माना जा रहा है।

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