एयर कार्गो के विस्तार के लिए “सी-एयर” कार्गो हब बनाने की जरूरत: मामिडाला

एयर कार्गो के विस्तार के लिए

नयी दिल्ली, 26 अप्रैल (वार्ता) देश में इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण के तेज विकास के बीच एयर कार्गो क्षेत्र में काफी संभावनाएं हैं और इसे भुनाने के लिए “सी-एयर” वाले बड़े कार्गो हब बनाने की जरूरत है जहां बंदरगाह और हवाई अड्डा एक साथ हों। एयर इंडिया कार्गो के प्रमुख और भारतीय एयर कार्गो फोरम (एसीएफआई) के उपाध्यक्ष रमेश मामिडाला का मानना है कि भारत का हवाई माल परिवहन (एयर कार्गो) अगले चार-पांच साल में तीन गुना होकर एक करोड़ टन तक पहुंचने की क्षमता रखता है। उन्होंने पश्चिम एशिया युद्ध के भारतीय एयर कार्गो क्षेत्र पर पड़े प्रभाव की भी बात की। श्री मामिडाला ने यहां एक कार्यक्रम से इतर समाचार एजेंसी ‘यूनीवार्ता’ के साथ एक विशेष बातचीत में कहा कि मौजूदा समय में देश में सालाना 35 लाख टन के अधिक एयर कार्गो का संचालन होता है जिसके इस साल के अंत तक 40 लाख टन पर पहुंचने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि अगले चार-पांच साल में यह आंकड़ा लगभग एक करोड़ टन पर पहुंच सकता है और साल 2047 तक इसके 2.5 करोड़ टन पर पहुंचने की संभावना है।

बेहतर होते सड़क संपर्क और जलमार्गों को सरकार द्वारा मिल रहे प्रोत्साहन के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि ये सभी माध्यम अच्छा प्रदर्शन करेंगे और एक-दूसरे के पूरक होंगे, प्रतिस्पर्द्धी नहीं। देश में सभी परिवहन माध्यमों की मांग बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि छोटे और मझौले शहरों से बड़े एयर कार्गो हब तक माल लाने के लिए अच्छी सड़कों की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बेहतर सड़क परिवहन का प्रभाव मुख्यतः क्षेत्रीय स्तर पर पड़ा है, खासकर गैर-मेट्रो शहरों के बीच। पहले जो घरेलू कार्गो एयरलाइंस द्वारा ले जाया जाता था, उसका कुछ हिस्सा अब सड़क मार्ग से जाने लगा है क्योंकि यह सस्ता और अधिक कुशल है। लेकिन इससे चिंता की बात नहीं है, क्योंकि उसके बदले एयर कार्गो की क्षमता अब ई-कॉमर्स और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों द्वारा उपयोग की जा रही है। भविष्य में हब-एंड-स्पोक मॉडल विकसित करने की जरूरत को रेखांकित करते हुए श्री मामिडाला ने कहा कि अभी देश में बड़े अंतर्राष्ट्रीय कार्गो हब नहीं हैं, लेकिन जैसे ही ये बनेंगे, गैर-मेट्रो रूट फीडर के रूप में काम करेंगे। अल्पावधि में एक करोड़ टन और 2047 तक ढाई करोड़ टन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए यह आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि घरेलू हवाई माल परिवहन में पिछले 10 साल में मजबूत वृद्धि हुई है और आने वाले समय में भी पांच-सात प्रतिशत वार्षिक विकास बना रहेगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कार्गो इससे अधिक तेजी से बढ़ेगा और क्षेत्र के विकास में मुख्य योगदान देगा। एयर इंडिया कार्गो के प्रमुख ने कहा कि हाल के वर्षों में आयात में कमी आयी है जबकि निर्यात में तेज वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण देश में विनिर्माण का बढ़ना है – मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाएं और अब रक्षा एवं एयरोस्पेस उत्पाद भी देश में ही बनाये जा रहे हैं। देश में एयर कार्गो कारोबार अन्य बड़े देशों की तुलना में कम होने के संबंध में श्री मामिडाला ने कहा कि बुनियादी ढांचों की कमी और मजबूत कार्गो हब का अभाव इसके मुख्य कारण हैं। अभी देश में ट्रांसशिपमेंट हब विकसित नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा कि नवी मुंबई और जेवर (नोएडा) जैसे एयरपोर्ट जो कार्गो पर फोकस कर रहे हैं, परिवर्तनकारी साबित हो सकते हैं। नोएडा एयरपोर्ट के आसपास बड़े विनिर्माण क्षेत्र हैं, जिससे यह तेजी से विकसित हो सकता है और निर्यात को अधिक कुशल बना सकता है।

नवी मुंबई एयरपोर्ट को पास के समुद्री बंदरगाह (जेएनपीटी) का लाभ मिलेगा। इससे “सी-एयर” लॉजिस्टिक्स संभव होगा – जहां माल परिवहन समुद्र और हवाई मार्ग दोनों से संभव हो सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दुबई, सिंगापुर और हांगकांग में यह मॉडल पहले से सफल है। भारत में यह अब संभव हो रहा है। भविष्य में ऐसे और एयरपोर्ट आने चाहिये। एयर कार्गो पर पश्चिम एशिया संकट के प्रभाव के बारे में श्री मामिडाला ने कहा कि इस युद्ध का वैश्विक एयर कार्गो पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। पश्चिम एशिया की प्रमुख एयरलाइंस जैसे एमिरेट्स, कतर एयरवेज और एतिहाद एयरवेज वैश्विक कार्गो में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जब इनकी सेवाएं प्रभावित हुईं, तो वैश्विक क्षमता का बड़ा हिस्सा, लगभग 25 प्रतिशत, अस्थायी रूप से बंद हो गया। इससे आपूर्ति में समस्या आई। एयर इंडिया जैसी जो एयरलाइंस चल रही थीं, उन्हें भी लंबा मार्ग अपनाना पड़ा, जिससे क्षमता कम हो गई। उन्होंने बताया कि विमान ईंधन की कीमतें बढ़ने के कारण लागत काफी बढ़ गई है, कुछ मामलों में दोगुनी से भी अधिक। इसका असर कार्गो दरों पर भी पड़ा है। कुछ बाजारों में कीमतें दोगुनी हो गईं, जबकि कुछ में 20–30 प्रतिशत तक बढ़ीं। इससे उपभोक्ताओं पर असर पड़ा और मांग में कमी आई।

विशेष रूप से भारत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि जल्द खराब होने वाले उत्पादों का बड़ी मात्रा में पश्चिम एशिया देशों को निर्यात होता था, लेकिन संचालन बाधित होने के कारण ये निर्यात लगभग बंद हो गये। एयर कार्गो क्षमता के बारे में श्री मामिडाला ने बताया कि फिलहाल मांग सिर्फ 35 लाख टन है जबकि भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय विमान सेवा कंपनियों को मिलाकर कुल क्षमता तकरीबन 1.2 करोड़ टन है जो मांग से तीन-चार गुणा है।

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