नई दिल्ली | अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर आग लग गई है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से भारतीय रिफाइनरियों को हर महीने लगभग 27,000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट नहीं आती है, तो घरेलू बाजार में तेल कंपनियों के इस घाटे की भरपाई के लिए पेट्रोल और डीजल के दामों में 25 से 28 रुपये प्रति लीटर तक की बड़ी बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।
रिपोर्ट में इस बात का भी संकेत दिया गया है कि वर्तमान में देश के कुछ हिस्सों, जैसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों के माहौल के कारण तेल की कीमतें स्थिर रखी गई हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि चुनाव प्रक्रिया समाप्त होते ही सरकार तेल कंपनियों को दाम बढ़ाने की अनुमति दे सकती है। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू खुदरा कीमतों के बीच का अंतर अब इतना बढ़ चुका है कि इसे लंबे समय तक बनाए रखना मुश्किल होगा। सरकार इस बोझ को कम करने के लिए ‘स्टैगर्ड अप्रोच’ (चरणबद्ध तरीके से बढ़ोतरी) अपना सकती है, ताकि जनता पर एक साथ आर्थिक बोझ न पड़े।
वैश्विक तेल आपूर्ति में आई इस बाधा का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाली सप्लाई का रुकना है। भारत के तेल आयात बिल में लगातार हो रही वृद्धि ने सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। हालांकि प्रशासन ने एक्साइज ड्यूटी में कटौती जैसे अस्थायी उपाय किए हैं, लेकिन कच्चे तेल की उच्च कीमतों के सामने ये राहत नाकाफी साबित हो रही है। आने वाले हफ्तों में वैश्विक घटनाक्रम और सरकार की नई रणनीति ही यह तय करेगी कि आपकी जेब पर कितना बड़ा असर पड़ने वाला है।

