सांची में करोड़ों की जल योजना बेपटरी: 5 साल बाद भी प्यासे कंठ, 2026 में भी अधूरा है सपना

सांची: विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक नगरी सांची में घर-घर जलापूर्ति का सपना अब तक अधूरा है. करोड़ों रुपए की लागत से शुरू की गई जल योजना पांच साल बाद भी पूरी नहीं हो सकी, जिससे नगर में पेयजल संकट लगातार गहराता जा रहा है.हालात यह हैं कि नगर के कई ट्यूबवेल जवाब दे चुके हैं, जबकि शेष का जलस्तर भी तेजी से गिर रहा है. इसके चलते लोगों की मटमैला और दूषित पानी मिलने की शिकायतें बड़ गई हैं. जानकारी के अनुसार, करीब 1.25 करोड़ रुपए की लागत से जल संवर्धन योजना शुरू की गई थी, जिसका क्रियान्वयन मध्यप्रदेश अर्बन डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड की
सौंपा गया था. वर्ष 2020 में शुरू हुई इस परियोजना को 2023 तक पूरा किया जाना था, लेकिन 2026 में भी यह अधूरी है. शुरुआत में हलाली डेम से पानी लाने की योजना बनाई गई थी, जिसे बाद में बदलकर लगभग 12 किलोमीटर दूर मरमटा नदी से जल लाने का निर्णय लिया गया. इसके तहत हेडगेवार कॉलोनी में फिल्टर प्लांट बनाया गया और नगर में पाइपलाइन बिछाने के लिए सड़कों की खुदाई की गई. साथ ही दो पानी की टंकियां भी बनाई गई, लेकिन इसके बावजूद घर घर जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी. परियोजना में देरी और लापरवाही को लेकर नगर परिषद की बैठकों में कंपनी को
क्या कहते हैं जिम्मेदार
नगर परिषद अध्यक्ष पप्पू रेवाराम ने कहा कि कंपनी की एक सप्ताह के भीतर जलापूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं. सीएमओ रामलाल कुचाह ने बताया कि निरीक्षण के बाद कंपनी ने 20 अप्रैल तक जलापूर्ति शुरू करने का आश्वासन दिया है. वहीं अर्बन डेवलपमेंट कंपनी के कई बार चेतावनी दी गई, लेकिन इसका असर नजर नहीं आया. प्रशासन के निर्देश भी कंपनी पर बेअसर रहे, जिसका खामियाजा आम जनता भुगत रही है. नगर परिषद के अनुसार, 19 ट्यूबवेल में से 5 पूरी तरह बंद हो चुके हैं, जबकि बाकी 14 का जलस्तर भी लगातार गिर रहा है. भीषण गर्मी
इंजीनियर आकाश का कहना है कि अधिकांश लाइनों की टेस्टिंग पूरी हो चुकी है और 20 अप्रैल तक सप्लाई शुरू कर दी जाएगी. फिलहाल करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी सांची के लोग पानी के लिए तरस रहे हैं और अब सभी की नजरें 20 अप्रैल की तय तारीख पर टिकी हुई हैं.

के बीच यह स्थिति और गंभीर हो गई है. इस मामले को लेकर नगर में कंपनी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं. लोगों का कहना है कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं

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