वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका की भूमिका को लेकर एक बड़ा बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मनमानियों के कारण अमेरिका पूरी दुनिया में लगभग अलग-थलग पड़ गया है. दरअसल, लंबे समय तक विश्व राजनीति का केंद्र रहे अमेरिका के सामने आज ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं, जहां उसके पारंपरिक सहयोगी भी उससे दूरी बनाते नजर आ रहे हैं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में यह बदलाव और अधिक स्पष्ट हुआ है, जिससे यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या अमेरिका अब वैश्विक नेतृत्व की अपनी भूमिका खो रहा है.
नाटो जैसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन में शामिल यूरोपीय देश, जो कभी हर परिस्थिति में अमेरिका के साथ खड़े रहते थे, अब स्वतंत्र रुख अपनाते दिख रहे हैं. खाड़ी क्षेत्र में जारी तनाव और युद्ध की स्थिति में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और पोलैंड जैसे देशों द्वारा अमेरिका को अपने सैन्य अड्डों और हवाई क्षेत्र के उपयोग की अनुमति न देना एक असाधारण घटना है. यह केवल एक सामरिक निर्णय नहीं, बल्कि कूटनीतिक संकेत भी है कि यूरोप अब आंख मूंदकर अमेरिका का समर्थन करने को तैयार नहीं है.
इसी संदर्भ में बुधवार को लंदन में आयोजित लगभग 40 देशों की वर्चुअल बैठक भी महत्वपूर्ण है. ब्रिटेन की पहल पर हुई इस बैठक में भारत, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने भाग लिया, लेकिन अमेरिका की अनुपस्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए. यह बैठक उस समय हुई जब होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग की सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है.
ट्रंप का यह बयान कि इस जलमार्ग को सुरक्षित रखना अमेरिका की जिम्मेदारी नहीं है, उनकी विदेश नीति के बदलते दृष्टिकोण को दर्शाता है. ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति के तहत वे वैश्विक जिम्मेदारियों से पीछे हटते नजर आ रहे हैं. हालांकि यह दृष्टिकोण घरेलू राजनीति में लोकप्रिय हो सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इससे अमेरिका की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है.
चीन ने भी इस स्थिति का लाभ उठाते हुए अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है. उसके विदेश मंत्री वांग यी ने स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य की अस्थिरता ईरान युद्ध का परिणाम है और इसका समाधान केवल युद्धविराम में निहित है. चीन का यह संतुलित और संवाद आधारित रुख उसे एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि अमेरिका की अनुपस्थिति उसकी छवि को कमजोर करती है.
भारत जैसे देश इस बदलते परिदृश्य में संतुलित भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं. लंदन बैठक में भारत की भागीदारी और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग सुरक्षा पर उसका स्पष्ट रुख यह दर्शाता है कि वह अब केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक मुद्दों पर भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है.
यह पूरी स्थिति एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के उभरने का संकेत देती है, जहां शक्ति का केंद्र केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रह गया है. यूरोप, चीन, भारत और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां अब अपने-अपने हितों के अनुसार निर्णय ले रही हैं. जाहिर है यह कहना गलत नहीं होगा कि डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने अमेरिका को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां उसे अपने वैश्विक नेतृत्व की भूमिका पर पुनर्विचार करना होगा. यदि अमेरिका इसी तरह अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों से पीछे हटता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब विश्व राजनीति में उसकी केंद्रीय भूमिका इतिहास का हिस्सा बन जाएगी.
