पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) से सामने आ रही घटनाएं एक बार फिर यह साबित कर रही हैं कि इस क्षेत्र पर इस्लामाबाद का नियंत्रण केवल सैन्य शक्ति, भय और दमन के बल पर कायम है. रावलाकोट, पुंछ और अन्य क्षेत्रों में प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, इंटरनेट बंदी और राजनीतिक असहमति को आतंकवाद के नाम पर कुचलने की कार्रवाई न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों का भी खुला उल्लंघन है.
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर जो कड़ा रुख अपनाया है, वह परिस्थितियों के अनुरूप और आवश्यक है. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने जिस स्पष्टता के साथ पाकिस्तान की पुलिस क्रूरता और बर्बरता की निंदा की है, वह केवल एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों की आवाज है जिन्हें वर्षों से अपने ही अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.
पीओके में वर्तमान अशांति किसी बाहरी हस्तक्षेप का परिणाम नहीं है. यह वहां के लोगों के भीतर वर्षों से जमा असंतोष का विस्फोट है. विधानसभा में 12 तथाकथित ‘शरणार्थी सीटों’ को लेकर स्थानीय जनता का विरोध इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तान वहां की राजनीतिक व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया का दुरुपयोग कर रहा है. जिन लोगों का क्षेत्र से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, उनके माध्यम से सत्ता संरचना को प्रभावित करना जनता की राजनीतिक इच्छा का अपमान है.
इसके साथ ही महंगाई, बिजली संकट और आर्थिक उपेक्षा ने हालात को और विस्फोटक बना दिया है. विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र से पाकिस्तान को बड़ी मात्रा में पनबिजली प्राप्त होती है, वहीं के नागरिकों को महंगी बिजली और बुनियादी सुविधाओं के अभाव का सामना करना पड़ रहा है. यह संसाधनों के शोषण और जनता की उपेक्षा का स्पष्ट उदाहरण है.
सबसे गंभीर प्रश्न मानवाधिकारों का है. शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाना, विरोध करने वाले संगठनों को आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंधित करना, इंटरनेट सेवाएं बंद करना और मीडिया पर नियंत्रण स्थापित करना संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार घोषणापत्र की मूल भावना के विपरीत है. पाकिस्तान अक्सर विश्व मंचों पर मानवाधिकारों की बात करता है, लेकिन पीओके में उसका व्यवहार उसकी दोहरी नीति को उजागर कर देता है.
भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की जो मांग की है, वह पूरी तरह उचित है. यदि दुनिया वास्तव में मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध है, तो उसे पीओके में हो रहे अत्याचारों पर भी उतनी ही गंभीरता दिखानी चाहिए जितनी वह अन्य क्षेत्रों के मामलों में दिखाती है. चयनात्मक संवेदनशीलता वैश्विक संस्थाओं की विश्वसनीयता को कमजोर करती है. सच्चाई यह है कि पीओके में उभर रहा जनाक्रोश पाकिस्तान की प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक दमन का प्रत्यक्ष परिणाम है. गोली, गिरफ्तारी और सेंसरशिप के बल पर जनता की आकांक्षाओं को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता. भारत का यह स्थायी और स्पष्ट रुख सही है कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उसका अभिन्न हिस्सा है तथा पीओके पर पाकिस्तान का कब्जा अवैध है. अब समय आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस सच्चाई को स्वीकार करे और पीओके की जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए पाकिस्तान पर ठोस दबाव बनाए.
