
नयी दिल्ली, 02 मार्च (वार्ता) ईरान के दो शीर्ष नेताओं की हत्या के बाद शनिवार को शुरू हुआ अमेरिका-ईरान युद्ध उम्मीद से कहीं अधिक लंबा खिंच सकता है। कई लोग एक छोटे और निर्णायक हमले की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन ईरानी सत्ता पश्चिम की उम्मीदों से कहीं अधिक मजबूती दिखा रही है।
अमेरिका और इजरायल ने शनिवार को ईरान में समन्वित हमले कर परमाणु सुविधाओं, सैन्य बुनियादी ढांचों, नौसैनिक अड्डों और वरिष्ठ नेताओं को निशाना बनाया था। तुरंत इसका जवाब देते हुए ईरान ने भी खाड़ी में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किये, जिसमें तीन अमेरिकी सैनिक मारे गए और कई अन्य घायल हो गए। इसके बाद अमेरिका ने फिर से जवाबी कार्रवाई का संकल्प दोहराया है। सोमवार तक इस संघर्ष को शुरू हुए कुछ ही दिन हुए हैं, लेकिन इसकी दिशा पहले से ही एक लंबे और जोखिम भरे युद्ध की ओर इशारा कर रही है।
पश्चिमी कमान के पूर्व फ्लैग-ऑफिसर-कमांडिंग वाइस एडमिरल शेखर सिन्हा (सेवानिवृत्त) ने यूनीवार्ता को बताया, “ईरानियों का प्रतिरोध का एक लंबा इतिहास रहा है। ईरान के पास मिसाइलों और ड्रोन का विशाल भंडार है और उनके सैन्य कारखाने उत्पादन बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा, ऐसे संकेत हैं कि रूस और चीन ने अपनी आपूर्ति लाइनें खोल दी हैं। मुझे डर है कि यह युद्ध कई लोगों के अनुमान से कहीं अधिक लंबा होगा।”
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका की ओर से ‘युद्ध के स्पष्ट लक्ष्यों’ की कमी के कारण भी शांति बहाली में मुश्किलें आ सकती हैं। अमेरिकी लगातार अपना लक्ष्य बदलते रहे हैं—कभी ईरान का परमाणु निरस्त्रीकरण, कभी मिसाइल कार्यक्रम को खत्म करना, तो कभी सत्ता परिवर्तन।
रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान (आईडीएसए) के पूर्व उप महानिदेशक मेजर जनरल आलोक देब ने यूनीवार्ता से बातचीत में कहा, “सत्ता परिवर्तन मुश्किल है क्योंकि ईरान के पास सैन्य और नागरिक नेतृत्व का एक बड़ा समूह है, जिसे नौकरशाही का भी समर्थन प्राप्त है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सोचना भी गलत हो सकता है कि ईरानी जनता शीर्ष नेताओं की हत्या का फायदा उठाकर सत्ता के खिलाफ विरोध कर देगी। ईरान एक प्राचीन राष्ट्र है जिसमें राष्ट्रवाद की भावना कूट-कूट कर भरी है, वहां के लोग स्थिरता के बदले अराजक सत्ता परिवर्तन को कभी नहीं चुनना चाहेंगे।
इसके अलावा, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या ने स्थितियों को और अधिक जटिल बना दिया है। रणनीतिक विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि इस हत्या ने कर्बला में इमाम हुसैन की शहादत की याद दिलाने वाली ‘शहादत और प्रतिरोध की शिया अवधारणा’ को सीधे तौर पर को जगा दिया है।
श्री चेलानी को लगता है कि ईरान जनता के इस दुख को किसी भी हाल में अनदेखा कर देने के पक्ष में नहीं है। अब किसी भी असहमति को सर्वोच्च नेता के हत्यारों के साथ मिलीभगत करार दिया जा सकता है।
श्री खामेनेई की मृत्यु के बाद ईरानी शासन का सैन्य और धार्मिक आग्रह और बढ़ सकता है। सबसे बड़ा खतरा ‘बदले की भावना’ में छिपा है। यदि ईरान को लगता है कि अमेरिकी हमले उसके अस्तित्व के लिए खतरा हैं, तो वह एक व्यापक युद्ध की ओर बढ़ सकता है। वह तेल संपत्तियों पर हमले कर सकता है, होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी कर तेल के वैश्विक परिवहन को बाधित कर सकता है, जो अंतत: वैश्विक संकट में बदल जाएगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से चार सप्ताह की समय सीमा का सुझाव दिया है, लेकिन उनके संदेश स्पष्ट नहीं हैं क्योंकि उन्होंने ईरान के नए नेतृत्व के साथ सौदा करने की इच्छा भी जताई है। ईरानी अधिकारियों ने भी मिले-जुले संकेत दिए हैं, उन्होंने सैद्धांतिक रूप से बात करने की इच्छा तो जताई है, लेकिन साथ ही चेतावनी दी है कि सिर पर बंदूक रखकर बातचीत संभव नहीं है।
एडमिरल सिन्हा ने कहा, “हमारे आकलन के अनुसार ईरान अपने हमलों में चयनात्मक होगा और आसानी से हार नहीं मानेगा।” चीन की भूमिका स्थिति को और जटिल बना रही है। जनवरी की रिपोर्टों के अनुसार, चीन ने ईरान को सैन्य उपकरणों की एक बड़ी खेप भेजी है।
फिर भी, यह संघर्ष अभी एक क्षेत्रीय युद्ध में बदल जाए यह जरूरी नहीं है। जहाँ अमेरिका को घरेलू राजनीतिक दबाव के साथ-साथ खाड़ी और अन्य क्षेत्रों में अपने सैन्य ठिकानों की सुरक्षा का भी दबाव झेलना पड़ रहा है। वहीं ईरान में भी जान-माल का नुकसान उसे बातचीत की ओर धकेल सकता है।
अंततः यह युद्ध दोनों पक्षों के गोला-बारूद के भंडार पर निर्भर करेगा, जब तक कि पूरी दुनिया हस्तक्षेप न करे और दोनों पक्षों को शांति के लिए सहमत न किया जाये।