
नयी दिल्ली, 27 मई (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने विनायक दामोदर सावरकर का नाम प्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग की रोकथाम) अधिनियम, 1956 की अनुसूची में नाम शामिल करने की मांग वाली रिट याचिका मंगलवार को खारिज कर दी।
मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और न्यायमूर्ति ए जी मसीह की पीठ ने पंकज फडनीस की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि याचिकाकर्ता अपने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन साबित करने में विफल रहा है, जो संविधान के अनुच्छेद 32 को लागू करने के लिए एक शर्त है।
शीर्ष अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश फडनीस ने दलीलें पेश करते हुए दावा किया कि उन्होंने सावरकर पर व्यापक शोध किया। उन्होंने कहा कि “कानूनी रूप से सत्यापन योग्य तरीके से सावरकर के बारे में कुछ तथ्य स्थापित करने” की उनकी मंशा है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी सावरकर के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करके संविधान के अनुच्छेद 51 ए के तहत मौलिक कर्तव्यों का उल्लंघन कर रहे हैं।
मुख्य न्यायाधीश गवई ने उनकी दलीलों के दौरान सवाल किया, “आपके मौलिक अधिकार का उल्लंघन क्या है?”
इस पर फडनीस ने जवाब दिया कि विपक्ष के नेता उनके मौलिक कर्तव्यों के पालन में बाधा नहीं डाल सकते। उन्होंने तर्क दिया, “विपक्ष के नेता मौलिक कर्तव्यों का उल्लंघन नहीं कर सकते।”
पीठ ने हालांकि स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 32 के तहत याचिकाएं केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में ही विचारणीय हैं, मौलिक कर्तव्यों के उल्लंघन के मामलों में नहीं।
शीर्ष अदालत ने आगे सुझाव दिया कि यदि याचिकाकर्ता चाहता है कि सावरकर का नाम शैक्षिक पाठ्यक्रम या आधिकारिक कार्यक्रमों में शामिल किया जाए, तो उसे केंद्र सरकार के समक्ष अपनी बात रखनी चाहिए। फडनीस ने अदालत को सूचित किया कि ऐसा पहले ही किया जा चुका है।
पीठ ने माना कि याचिका में मांगी गई राहत अनुच्छेद 32 याचिका के माध्यम से नहीं दी जा सकती।
प्रतीक और नाम (अनुचित प्रयोग की रोकथाम) अधिनियम, 1956 के तहत समावेशन इसकी अनुसूची में निर्दिष्ट नामों और प्रतीकों के उपयोग को प्रतिबंधित करता है, ताकि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों के विपरीत उनके अनुचित उपयोग को रोका जा सके। यह मुद्दा न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अगुवाई वाली एक अन्य पीठ द्वारा हाल ही में की गई न्यायिक टिप्पणियों के बीच आया है, जिसने सावरकर के बारे में राहुल गांधी की टिप्पणी पर आपत्ति जताई थी।
