फरवरी 2026 भारत-इज़राइल संबंधों के इतिहास में एक निर्णायक अध्याय के रूप में दर्ज हो चुका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 25-26 फरवरी की इज़राइल यात्रा के दौरान द्विपक्षीय रिश्तों को ‘शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक उन्नत किया जाना केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में साझा दृष्टि का स्पष्ट उद्घोष है. कुल 16-17 प्रमुख समझौतों पर हस्ताक्षर इस बात का संकेत हैं कि दोनों देश अब लेन-देन के पारंपरिक ढांचे से निकलकर दीर्घकालिक सामरिक सहनिर्माण की दिशा में बढ़ चुके हैं.
रक्षा और सुरक्षा सहयोग इस यात्रा का सबसे सशक्त स्तंभ रहा. अब संबंध केवल हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि सह-विकास और सह-उत्पादन पर केंद्रित होंगे. उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणाली जैसे आयरन डोम या आयरन बीम के भारतीय संस्करण, ड्रोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्ध प्रणालियों पर संभावित 10 अरब डॉलर के सौदे भारत की सुरक्षा संरचना को नई ऊंचाई देंगे. महत्वपूर्ण यह है कि तकनीक हस्तांतरण की प्रतिबद्धता भारत को आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की दिशा में ठोस बढ़त देगी. आतंकवाद विरोधी सहयोग और खुफिया साझाकरण पर दोहराई गई प्रतिबद्धता ऐसे समय में अत्यंत प्रासंगिक है, जब वैश्विक अस्थिरता और गैर-राज्य कारकों की सक्रियता बढ़ रही है.
आर्थिक आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 3.62 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार, मुक्त व्यापार समझौते यानी एफटीए के बाद कहीं अधिक विस्तार पा सकता है. यदि 2026 के अंत तक एफटीए अंतिम रूप ले लेता है, तो व्यापारिक बाधाएं घटेंगी, निवेश प्रवाह बढ़ेगा और नवाचार आधारित उद्योगों को गति मिलेगी. इज़राइल में यूपीआई की स्वीकार्यता सीमा-पार लेनदेन को सरल बनाएगी. यह डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के भारतीय मॉडल की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है. अगले पांच वर्षों में 50 हजार अतिरिक्त भारतीय श्रमिकों की नियुक्ति का समझौता श्रमिक गतिशीलता और कौशल निर्यात को नई दिशा देगा.
उभरती प्रौद्योगिकियों में साझेदारी इस संबंध की वास्तविक दीर्घकालिक शक्ति है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान के लिए कोष बढ़ाया जाना दूरदर्शी कदम है. भारत में साइबर सुरक्षा उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना डिजिटल सुरक्षा ढांचे को सुदृढ़ करेगी. यह सहयोग केवल तकनीकी नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है, क्योंकि भविष्य के युद्ध, अर्थव्यवस्था और शासन सभी डेटा और डिजिटल प्रणालियों पर आधारित होंगे.
कृषि, जल प्रबंधन और समुद्री विरासत जैसे क्षेत्रों में समझौते यह दर्शाते हैं कि संबंध बहुस्तरीय हैं. भारत-इज़राइल नवाचार केंद्र के माध्यम से आधुनिक खेती और जल तकनीक का विस्तार भारतीय कृषि को अधिक उत्पादक और जल-संवेदनशील बनाएगा. लोथल में राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर का विकास सांस्कृतिक और आर्थिक संपर्क को ऐतिहासिक गहराई देगा. वहीं आईएमईसी और आई2यू2 जैसी बहुपक्षीय पहलों पर बल, भारत-इज़राइल साझेदारी को व्यापक क्षेत्रीय ढांचे से जोड़ता है.स्पष्ट है कि यह संबंध अब केवल द्विपक्षीय नहीं, बल्कि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रणनीतिक संतुलन का हिस्सा है. भारत को इस साझेदारी से रक्षा आत्मनिर्भरता, तकनीकी उन्नति और आर्थिक विस्तार का अवसर मिलेगा, जबकि इज़राइल को विशाल बाजार, विश्वसनीय साझेदार और क्षेत्रीय स्थिरता का आधार. चुनौती यह होगी कि समझौतों को समयबद्ध क्रियान्वयन में बदला जाए. यदि ऐसा हुआ, तो फरवरी 2026 को भविष्य में उस क्षण के रूप में याद किया जाएगा, जब भारत और इज़राइल ने भरोसे को साझी शक्ति में रूपांतरित कर दिया.
