ईरान-अमेरिका-इज़रायल युद्ध तुरंत रुकना जरूरी

इसराइल और अमेरिका के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खैमनई मारे गए हैं. इस वजह से स्थिति और भयावह हो गई है. ईरान ने बदले की कार्रवाई करते हुए आठ खाड़ी के देशों पर हमला किया है. पाकिस्तान के कराची में अमेरिकी दूतावास के खिलाफ उग्र प्रदर्शन हुए हैं. इस कारण पुलिस की गोलीबारी में 12 लोगों की मृत्यु हुई है. जाहिर है ईरान युद्ध की स्थिति बद से बदतर हो गई है.दरअसल,मध्य पूर्व एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा है. ईरान द्वारा पलटवार, खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले, दुबई-अबू धाबी में अलर्ट और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का ठप होना. ये संकेत हैं कि यह संघर्ष सीमित नहीं रहने वाला. यदि हालात पर तुरंत काबू नहीं पाया गया, तो यह टकराव क्षेत्रीय युद्ध से वैश्विक संकट में बदल सकता है. इसलिए इस जंग का अविलंब रुकना केवल राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि वैश्विक आवश्यकता है.यह संघर्ष केवल तीन देशों की प्रतिद्वंद्विता नहीं है. हॉर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 25 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है. ईरान ने इस जलमार्ग को बंद कर दिया है.तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार हो सकती हैं. इसका सीधा असर हर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. ईंधन महंगा होगा. परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ेगी. अंतत: आम नागरिक की थाली पर बोझ बढ़ेगा. वैश्विक मुद्रास्फीति की एक नई लहर दुनिया को जकड़ सकती है. शेयर बाजारों में गिरावट और निवेशकों का भरोसा डगमगाना इस संकट को और गहरा करेगा.

भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है. देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. उसका बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है. तेल महंगा होने पर व्यापार घाटा बढ़ेगा. रुपया दबाव में आएगा. विकास दर प्रभावित होगी. इसके साथ ही खाड़ी देशों में रह रहे लगभग 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा भी बड़ा प्रश्न बन जाएगी. यदि संघर्ष फैलता है तो न केवल उनकी जान जोखिम में पड़ेगी. बल्कि भारत को मिलने वाली भारी विदेशी मुद्रा, रेमिटेंस, पर भी असर पड़ेगा. चाबहार बंदरगाह और मिडल ईस्ट-यूरोप कॉरिडोर जैसी रणनीतिक परियोजनाएं अधर में लटक सकती हैं.

मानवीय दृष्टि से भी यह युद्ध भयावह परिणाम दे सकता है. गाजा और पश्चिम एशिया पहले से अस्थिर हैं. एक नया सैन्य मोर्चा लाखों लोगों को विस्थापित करेगा. निर्दोष नागरिक, महिलाएं और बच्चे इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाएंगे. इसके साथ परमाणु खतरे की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका-इज़रायल की सैन्य शक्ति को देखते हुए किसी भी गलत आकलन से हालात नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं. इतिहास गवाह है कि युद्ध की शुरुआत आसान, लेकिन अंत कठिन होता है. ऐसे समय में संयम और कूटनीति ही समाधान है. संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ, रूस, चीन और क्षेत्रीय शक्तियों को तत्काल मध्यस्थता की पहल करनी चाहिए. युद्धविराम, मानवीय

गलियारे ,संवाद की पुन: शुरुआत. ये तीन कदम तत्काल उठाए जाने चाहिए. शक्ति प्रदर्शन से अस्थायी संतोष मिल सकता है. पर स्थायी शांति केवल वार्ता से संभव है. आज दुनिया कोविड-19 के बाद आर्थिक पुनरुद्धार की राह पर है. एक लंबा युद्ध वैश्विक मंदी को जन्म दे सकता है. जिसकी कीमत आने वाली पीढिय़ां चुकाएंगी. इसलिए यह समय भावनाओं के उफान में बहने का नहीं है. बल्कि दूरदर्शिता दिखाने का है. मध्य पूर्व की आग यदि भडक़ती है तो उसकी लपटें हर देश तक पहुंचेंगी. भारत सहित पूरी दुनिया की जिम्मेदारी है कि वह शांति का पक्ष ले. कूटनीतिक समाधान के लिए दबाव बनाए. युद्ध नहीं. संवाद ही भविष्य का मार्ग है. जाहिर है विश्व शांति और अर्थव्यवस्था के लिए यह विनाशकारी युद्ध तुरंत रुकना जरूरी है.

 

 

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