बुधवार को विश्व पृथ्वी दिवस मनाया गया. 56 वें पृथ्वी दिवस पर सवाल सीधा है कि क्या हम सच में अपनी धरती को बचाने के लिए तैयार हैं, या फिर यह दिन भी सोशल मीडिया पोस्ट और प्रतीकात्मक वृक्षारोपण तक सीमित रह जाएगा ?
वास्तविकता यह है कि हमने विकास के नाम पर प्रकृति के साथ संतुलन नहीं, बल्कि संघर्ष का रास्ता चुना है. शहरीकरण की अंधी दौड़, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का बेलगाम दोहन आज पर्यावरण असंतुलन की सबसे बड़ी वजह बन चुके हैं. जैव विविधता का तेजी से ह्रास हो रहा है. जिन वन्यजीवों के साथ यह पृथ्वी साझा थी, उनके आवास नष्ट हो रहे हैं और अनेक प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं. यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व पर मंडराता खतरा है.
प्रदूषण की स्थिति और भी चिंताजनक है. हवा जहरीली हो चुकी है, नदियाँ विषाक्त हो रही हैं और मिट्टी अपनी उर्वरता खोती जा रही है. इसका सीधा असर हमारे स्वास्थ्य, कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. सवाल यह है कि क्या हम इस संकट को केवल आंकड़ों में देखकर संतुष्ट हो जाएंगे, या इसके समाधान के लिए ठोस कदम उठाएंगे ?
ग्लोबल वार्मिंग अब किसी भविष्यवाणी का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान का कठोर सच है. पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है और इसके परिणाम हमारे सामने हैं,ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और मौसम का मिजाज अनिश्चित होता जा रहा है. कहीं भीषण बाढ़ है तो कहीं लंबा सूखा, कहीं चक्रवातों की तीव्रता बढ़ रही है. वैज्ञानिक स्पष्ट चेतावनी दे चुके हैं कि यदि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर नहीं रोका गया, तो परिणाम विनाशकारी होंगे. इसके बावजूद वैश्विक और स्थानीय स्तर पर प्रयास अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं.
ऐसे में यह समझना जरूरी है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है. यह हर नागरिक का कर्तव्य है. बड़े-बड़े भाषणों और घोषणाओं से अधिक प्रभाव छोटे-छोटे व्यवहारिक बदलावों से आता है. सिंगल-यूज प्लास्टिक से दूरी, ऊर्जा की बचत, जल संरक्षण, और नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों को अपनाना,ये कदम मामूली लग सकते हैं, लेकिन इनका सामूहिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है.
वृक्षारोपण भी तभी सार्थक है, जब उसे अभियान नहीं, जिम्मेदारी के रूप में लिया जाए. पेड़ लगाना आसान है, लेकिन उसे बचाकर बड़ा करना ही असली पर्यावरण सेवा है. इसी तरह ‘सतत जीवनशैली’ को अपनाना समय की मांग है, जहां उपभोग सीमित हो और अपशिष्ट न्यूनतम.
दरअसल, पृथ्वी के पास हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन हमारे लालच के लिए नहीं. यदि हमने अब भी अपनी जीवनशैली और विकास मॉडल पर पुनर्विचार नहीं किया, तो आने वाली पीढिय़ों के लिए एक असुरक्षित और असंतुलित दुनिया छोड़ जाएंगे.
विश्व पृथ्वी दिवस हमें यही संदेश देता है कि अब प्रतीकात्मकता नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई का समय है. हमें उपभोक्ता नहीं, संरक्षक बनना होगा. क्योंकि अंतत: यह सच अटल है,पृथ्वी बचेगी, तभी मानव सभ्यता भी बचेगी.
