भारत-कोरिया के बीच संबंधों का नया दौर

भारत और दक्षिण कोरिया के बीच तेजी से गहराता आर्थिक और रणनीतिक रिश्ता अब एक नए निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है. दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग का भारत दौरा और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर 54 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एशिया की दो उभरती ताकतों के बीच भविष्य की साझेदारी का स्पष्ट संकेत है. 16 एमओयू पर हस्ताक्षर और ‘भारत-कोरिया औद्योगिक सहयोग समिति’ का गठन इस दिशा में ठोस कदम हैं.

भारत और दक्षिण कोरिया के संबंधों की नींव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भी है. आधुनिक दौर में 1973 में राजनयिक संबंधों की स्थापना के बाद यह रिश्ता लगातार विकसित हुआ और 2010 में इसे ‘विशेष रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा दिया गया. तब से रक्षा, व्यापार, तकनीक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में लगातार विस्तार हुआ है.

मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में, जहां आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन हो रहा है और तकनीकी प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, भारत और कोरिया की साझेदारी का महत्व और बढ़ जाता है. सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग दोनों देशों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बढ़त दिला सकता है. भारत के पास विशाल बाजार, युवा कार्यबल और बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था है, जबकि दक्षिण कोरिया के पास उन्नत तकनीक, अनुसंधान क्षमता और औद्योगिक दक्षता है. यह संयोजन ‘विन-विन’ स्थिति तैयार करता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘चिप्स से शिप्स’ तक सहयोग का विजन इस रिश्ते की व्यापकता को दर्शाता है. कोरिया पहले से ही भारत में ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और शिप बिल्डिंग सेक्टर में बड़ा निवेशक रहा है. सैमसंग, एलजी, हुंडई और किआ जैसी कंपनियां भारतीय बाजार में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं. अब यदि सेमीकंडक्टर निर्माण और एआई जैसे क्षेत्रों में भी कोरियाई निवेश आता है, तो भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल को नई गति मिल सकती है.

हालांकि, इस साझेदारी के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं. भारत-कोरिया व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता की समीक्षा लंबे समय से लंबित है, जिससे व्यापार असंतुलन और बाजार पहुंच से जुड़े मुद्दे बने हुए हैं. भारत को अपनी विनिर्माण क्षमता और लॉजिस्टिक्स ढांचे को और मजबूत करना होगा, ताकि कोरियाई निवेश को अधिक आकर्षित किया जा सके. वहीं, कोरिया को भी भारतीय बाजार की जटिलताओं को समझते हुए दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी.

कुल मिलाकर, भारत और दक्षिण कोरिया के बीच यह नया आर्थिक और तकनीकी गठजोड़ केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में संतुलन और स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है. यदि दोनों देश अपने साझा हितों और क्षमताओं का सही उपयोग करते हैं, तो यह साझेदारी न केवल 54 अरब डॉलर के लक्ष्य को हासिल करेगी, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नई शक्ति के रूप में उभर सकती है.

 

 

Next Post

आईएसबीटी संचालन में पुणे की कंपनी योग्य

Wed Apr 22 , 2026
इंदौर: शहर में एमआर-10 सड़क पर आईडीए ने सौ करोड़ रुपए की लागत से आईएसबीटी का निर्माण किया है. उक्त आईएसबीटी के रख रखाव और संधारण हेतु आईडीए ने 5वीं बार टेंडर निकाले थे. टेंडर में पुणे की डीवीजी इंडिया लिमिटेड कंपनी योग्यता में खरी पाई गई है. उक्त कंपनी […]

You May Like