‘ओम वांगमय का सार है: मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज

जबलपुर: ‘ओम वांगमय का सार है, अ, उ और म मिलने से ओम बनता है, ‘सिद्ध चक्र की आराधना कोई साधारण आराधना नहीं, यह हमारे आत्मोत्कर्ष का आधार हैं । उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने श्री सिद्धचक्र विधान के दूसरे दिवस प्रात:कालीन धर्म सभा में व्यक्त किये। इस दौरान मुनि श्री ने ये भी कहा कि आप यहां मंडल की आराधना कर रहे हैं,यह मंडल कोई दैवी शक्ति मात्र नहीं है,यह विशुद्धतया आध्यात्मिक आराधना है, इस मंडल में जो संरचनाएं हैं, वह सब एक साधारण प्राणी को सिद्धि तक पहुंचाने का मार्ग है।

इसमें गहन अध्यात्म छिपा हुआ है। मुनि श्री ने कहा कि सिद्ध चक्र की आराधना तो सब करते हैं, हमने भी आज रात्रि में सिद्ध चक्र महामंडल का पूरा ध्यान किया,उसके एक एक मंत्र और अक्षर पर गंभीरता से विचार किया, जब गहरे डूबा तो मुझे लगता है कि अभी और गहराई में जाने की आवश्यकता है।

इस संबंध में प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं सुवोध कामरेड ने बताया मुनि श्री ने अंत में भावनायोग के माध्यम से पंचपरमेष्ठी का ध्यान कराया। प्रात:काल भगवान का अभिषेक एवं शांतिमंत्रों के साथ शांतीधारा मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज के मुखारविंद से संपन्न हुई। दौपहर में शंकासमाधान का कार्यक्रम संपन्न हुआ। एवं सांयकाल अग्रवाल कालोनी में नूतन जिनालय का शिलान्यास कार्यक्रम संपन्न हुआ एवं संध्याकाल में आचार्य भक्ति के बाद मंडल आरती संपन्न हुई।

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