जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में मजदूरों पर हुआ नृशंस आतंकी हमला केवल दो निर्दोष भारतीय नागरिकों की हत्या भर नहीं है, बल्कि यह भारत की आंतरिक शांति, सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती देने का एक सुनियोजित प्रयास है. जिस प्रकार आतंकियों ने पहले नाम और धर्म पूछा, फिर पानी मांगा और उसके बाद गोलियां बरसा दीं, उससे स्पष्ट है कि उनका उद्देश्य केवल हत्या करना नहीं, बल्कि समाज में भय, अविश्वास और सांप्रदायिक तनाव फैलाना था. यह हमला पहलगाम जैसी आतंकी वारदात की पुनरावृत्ति है, जो बताता है कि आतंकवाद का चेहरा आज भी उतना ही क्रूर और अमानवीय है.
प्रारंभिक जांच में जिस प्रकार लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आतंकी लतीफ बट का नाम सामने आया है, उससे यह भी स्पष्ट होता है कि सीमा पार बैठे आतंकी आकाओं के इशारे पर यह साजिश रची गई. ऐसे हमले किसी एक व्यक्ति या संगठन की सनक नहीं होते, बल्कि पाकिस्तान की धरती और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में सक्रिय आतंकी ढांचे की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा होते हैं. भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस सच को उजागर करता आया है कि आतंकवाद को संरक्षण और संसाधन उपलब्ध कराने वाले तंत्र को समाप्त किए बिना स्थायी शांति संभव नहीं है.
इस हमले का समय भी कई सवाल खड़े करता है. पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पिछले कुछ समय से जनता का असंतोष खुलकर सामने आ रहा है. वहां आर्थिक बदहाली, प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक दमन के विरुद्ध विरोध-प्रदर्शन तेज हुए हैं. ऐसे माहौल में सीमा पार से भारत में आतंकी घटनाओं को अंजाम देकर पाकिस्तान की सत्ता और वहां सक्रिय आतंकी संगठन दुनिया का ध्यान पीओके के संकट से हटाने का प्रयास कर सकते हैं. हालांकि किसी एक घटना के पीछे अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाले जा सकते हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि आतंकवाद का इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक और रणनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता रहा है.
ऐसे समय में भारत को केवल निंदा तक सीमित नहीं रहना चाहिए. सुरक्षा एजेंसियों को आतंकियों के पूरे नेटवर्क, उनके स्थानीय सहयोगियों और वित्तीय स्रोतों पर निर्णायक प्रहार करना होगा. सीमा पर निगरानी और घुसपैठ रोकने के उपायों को और अधिक सशक्त बनाने के साथ-साथ खुफिया तंत्र के समन्वय को भी मजबूत करना होगा. आतंकवाद के प्रति किसी भी स्तर पर नरमी या शिथिलता का संदेश नहीं जाना चाहिए. जो भी व्यक्ति आतंकियों को शरण, सहायता या सूचना उपलब्ध कराता है, उसके विरुद्ध भी कठोरतम कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए.
साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के मुद्दे को और अधिक प्रभावी ढंग से उठाना चाहिए. दुनिया को यह समझना होगा कि आतंकवाद किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की समस्या है. यदि आतंकवाद के संरक्षकों पर समय रहते दबाव नहीं बनाया गया, तो उसका दुष्परिणाम वैश्विक शांति को भी भुगतना पड़ेगा.
निर्दोष नागरिकों का रक्त किसी भी सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य है. कुलगाम की यह घटना यह याद दिलाती है कि आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है. सरकार को ऐसी हर साजिश का जवाब केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कठोर, त्वरित और निर्णायक कार्रवाई से देना होगा, ताकि आतंक के आकाओं और उनके संरक्षकों दोनों को यह संदेश मिल जाए कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा के प्रश्न पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा.
