मुंबई | मुंबई में मेयर पद को लेकर मचे सियासी घमासान के बीच कल, 21 जनवरी का दिन महाराष्ट्र की राजनीति के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के चुनाव चिह्न विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई होनी है। यदि शीर्ष अदालत का फैसला एकनाथ शिंदे गुट के खिलाफ आता है, तो न केवल चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ उनके हाथ से निकल सकता है, बल्कि बीएमसी (BMC) सत्ता का पूरा समीकरण भी पलट सकता है। उद्धव ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें शिंदे गुट को असली शिवसेना माना गया था, जिससे अब कानूनी और राजनीतिक लड़ाई चरम पर है।
अदालती कार्यवाही के समांतर, भाजपा और शिंदे गुट के बीच मेयर पद के बंटवारे को लेकर दरारें गहरी होती दिख रही हैं। मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने ढाई-ढाई साल के लिए मेयर पद साझा करने का प्रस्ताव रखा था, जिसे भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने सिरे से खारिज कर दिया है। भाजपा का मानना है कि मुंबई में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद शिंदे गुट को यह पद सौंपने से जनता के बीच ‘कमजोरी’ का संदेश जाएगा। पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिया है कि बीएमसी के नए मेयर का फैसला पूरी तरह देवेंद्र फडणवीस की रणनीति और सहमति के आधार पर होगा, जिससे शिंदे गुट में बेचैनी बढ़ गई है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा किसी भी कीमत पर यह नहीं दिखाना चाहती कि वह मुंबई में शिंदे गुट पर निर्भर है। भाजपा का तर्क है कि पूरा चुनाव देवेंद्र फडणवीस के चेहरे और रणनीति पर लड़ा गया था, इसलिए कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने के लिए मेयर भी भाजपा का ही होना चाहिए। यदि भाजपा इस मांग पर अड़ी रहती है और उधर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी प्रतिकूल आता है, तो महाराष्ट्र के सत्ता गठबंधन (महायुति) में बड़ा संकट पैदा हो सकता है। फिलहाल, कल होने वाली सुनवाई मुंबई की सत्ता और राज्य के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करेगी।

