री-टेंडरिंग में देरी से रेत खदानें बंद, अवैध उत्खनन पर नियंत्रण नहीं

कटनी: जिले में री-टेंडरिंग प्रक्रिया पूरी न होने के कारण लगभग 55 करोड़ रुपये मूल्य की 49 रेत खदानें बीते तीन महीनों से संचालन में नहीं आ सकी हैं। इस स्थिति के चलते जिले के विभिन्न नदी क्षेत्रों से अवैध रेत उत्खनन और परिवहन की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। जानकारों के अनुसार इससे शासन को अब तक 20 करोड़ रुपये से अधिक के संभावित राजस्व नुकसान का अनुमान है।खनिज विभाग के अनुसार रेत खनन को लेकर सख्ती बरती जा रही है, लेकिन स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नवंबर–दिसंबर में दिखाई गई सक्रियता के बाद कार्रवाई की गति में कमी आई है।

इक्का-दुक्का मामलों में ट्रैक्टर-ट्रॉली जब्ती को छोड़ दें तो खनिज, पुलिस, राजस्व एवं वन विभाग की संयुक्त कार्रवाई अपेक्षित स्तर पर नजर नहीं आ रही है।वैध अनुमति के बिना रेत की आपूर्ति पर सवाल जानकारी के अनुसार पिछले साढ़े छह महीनों से जिले में किसी भी ठेकेदार को रेत उत्खनन की वैध अनुमति प्राप्त नहीं है। इसके बावजूद शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में रेत की उपलब्धता बनी हुई है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि रेत किन घाटों से और किस व्यवस्था के तहत बाजार तक पहुँच रही है। प्रशासनिक स्तर पर इस पूरे तंत्र की विस्तृत जांच की मांग उठने लगी है।
कार्रवाई के बावजूद शिकायतें जारी
पुलिस व प्रशासन द्वारा समय-समय पर कार्रवाई की गई है।7 जनवरी को बड़वारा पुलिस ने रोहनिया गांव से एक ट्रैक्टर-ट्रॉली जब्त की।20 दिसंबर को दतला नदी घाट से चार ट्रैक्टर पकड़े गए।
बड़वारा के गुड़ा मोड़, सिलौड़ी चौकी क्षेत्र, ढीमरखेड़ा के पिपरिया शुक्ल और बरही तहसील के साली रूहानिया क्षेत्र में भी अलग-अलग मामलों में बिना वैध दस्तावेज रेत परिवहन करते वाहन जब्त किए गए।
हालांकि स्थानीय निवासियों का कहना है कि इन कार्रवाइयों के बावजूद कई क्षेत्रों में अवैध खनन की गतिविधियाँ पूरी तरह नहीं रुक पाई हैं।पर्यावरण और राजस्व दोनों पर असरविशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते समन्वित और प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई, तो इससे न केवल सरकारी राजस्व को नुकसान होगा, बल्कि नदियों के पर्यावरणीय संतुलन पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि अवैध उत्खनन पर नियंत्रण के लिए निगरानी बढ़ाई जा रही है और दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

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