केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 30 मार्च 2026 को लोकसभा में भारत को ‘नक्सल मुक्त’ घोषित करना केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जाना चाहिए. दशकों तक देश के अनेक हिस्सों—विशेषकर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश,में नक्सलवाद ने न केवल कानून-व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि विकास की धारा को भी बाधित किया. ऐसे में इस समस्या के समाधान का दावा अपने आप में एक बड़े परिवर्तन का संकेत है.
सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़े इस परिवर्तन की पुष्टि करते हैं. कभी 126 जिलों तक फैला नक्सल प्रभाव अब शून्य पर सिमट गया है—कम से कम ‘अत्यधिक प्रभावित’ श्रेणी में. 706 नक्सलियों का मुठभेड़ों में मारा जाना, 4,839 का आत्मसमर्पण और 2,218 की गिरफ्तारी इस बात का संकेत है कि सुरक्षा बलों ने लगातार और सुनियोजित अभियान चलाया. लेकिन केवल इन आंकड़ों के आधार पर इस सफलता को समझना अधूरा होगा.
असल में, इस पूरे अभियान की रीढ़ रहा है ‘सुरक्षा और विकास’ का दोहरा मॉडल. एक ओर जहां सुरक्षा बलों ने सख्ती से नक्सली ढांचे को तोड़ा, वहीं दूसरी ओर सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया. लगभग ?20,000 करोड़ की लागत से सडक़ों का निर्माण, स्कूलों की स्थापना और संचार सुविधाओं का विस्तार,इन सबने उन क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोडऩे में अहम भूमिका निभाई. बस्तर जैसे इलाके, जो कभी ‘रेड कॉरिडोर’ के प्रतीक थे, अब विकास के नए केंद्र बनने की ओर अग्रसर हैं.
हालांकि, इस उपलब्धि का मूल्यांकन करते समय कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठते हैं. क्या नक्सलवाद का पूर्ण अंत वास्तव में हो चुका है, या यह केवल उसके संगठित स्वरूप का विघटन है. इतिहास बताता है कि विचारधाराएं केवल सैन्य कार्रवाई से समाप्त नहीं होतीं. वे सामाजिक-आर्थिक असमानताओं, स्थानीय असंतोष और शासन की विफलताओं से पुन: जन्म ले सकती हैं. ऐसे में यह आवश्यक है कि सरकार विकास कार्यों को निरंतरता दे और स्थानीय समुदायों के विश्वास को बनाए रखे.
गृहमंत्री द्वारा ‘अर्बन नक्सल’ पर सख्त रुख अपनाने की चेतावनी भी एक नई बहस को जन्म देती है. यह सच है कि किसी भी प्रकार की हिंसक विचारधारा को वैचारिक समर्थन देना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती है, लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि वैचारिक असहमति और लोकतांत्रिक आलोचना को ‘नक्सल समर्थन’ के दायरे में न रखा जाए. लोकतंत्र की मजबूती इसी संतुलन में निहित है.
राजनीतिक दृष्टिकोण से भी यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है. केंद्र सरकार ने इसे अपनी निर्णायक नीति और मजबूत इच्छाशक्ति का परिणाम बताया है, जबकि विपक्ष इसे आंकड़ों और परिभाषाओं के खेल के रूप में देख सकता है. ऐसे में पारदर्शिता और स्वतंत्र मूल्यांकन इस उपलब्धि की विश्वसनीयता को और मजबूत करेंगे. बहरहाल,‘नक्सल मुक्त भारत’ का यह दावा एक नई शुरुआत का अवसर है. यह केवल सुरक्षा की जीत नहीं, बल्कि उस भारत के निर्माण की दिशा में कदम है जहां विकास, न्याय और समान अवसर हर नागरिक तक पहुंचे. यदि सरकार इस उपलब्धि को स्थायी बनाना चाहती है, तो उसे बंदूक की जगह भरोसे, और कार्रवाई के साथ संवेदनशीलता को भी समान महत्व देना होगा. तभी यह घोषणा इतिहास में एक स्थायी उपलब्धि के रूप में दर्ज हो सकेगी.
