प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई साढ़े चार घंटे लंबी मंत्रिपरिषद बैठक केवल प्रशासनिक समीक्षा भर नहीं थी, बल्कि यह उस भारत की रूपरेखा तय करने का प्रयास थी, जिसे सरकार वर्ष 2047 तक ‘विकसित राष्ट्र’ के रूप में देखना चाहती है. आजादी के शताब्दी वर्ष को लक्ष्य बनाकर केंद्र सरकार जिस प्रकार दीर्घकालिक नीति, संरचनात्मक सुधार और प्रशासनिक बदलावों पर फोकस कर रही है, उससे स्पष्ट है कि ‘विकसित भारत 2047’ अब केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि शासन का केंद्रीय विजन बन चुका है. बैठक में प्रधानमंत्री मोदी का यह संदेश महत्वपूर्ण है कि ‘जो हो गया, उसे पीछे छोडि़ए, अब भविष्य पर फोकस कीजिए.’ यह कथन दरअसल भारतीय शासन व्यवस्था की उस मानसिकता को बदलने का संकेत है, जो लंबे समय तक तात्कालिक राजनीति और अल्पकालिक योजनाओं तक सीमित रही. मोदी सरकार अब मंत्रालयों से अगले दो-तीन वर्षों की नहीं, बल्कि अगले दो दशकों की सोच के साथ काम करने की अपेक्षा कर रही है. यही कारण है कि सभी मंत्रालयों को कानून, नियम, नीति और कार्यशैली—इन चार स्तरों पर सुधारों का रोडमैप प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए.
इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इज आफ लिविंग पर जोर रहा. पिछले एक दशक में सरकार ने इज अआफ डूइंग बिजनेस के जरिए निवेश और कारोबार का माहौल सुधारने की कोशिश की, लेकिन अब फोकस सीधे नागरिक जीवन की गुणवत्ता पर है. आम आदमी को सरकारी दफ्तरों, कागजी प्रक्रियाओं और नौकरशाही की जटिलताओं से राहत देना ही असली सुशासन की कसौटी बनेगा. प्रधानमंत्री द्वारा फाइलों के त्वरित निपटारे और अनावश्यक देरी समाप्त करने पर दिया गया जोर इसी सोच को दर्शाता है.
‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ का मंत्र भी इस बैठक का केंद्रीय संदेश रहा. इसका अर्थ केवल सरकारी हस्तक्षेप कम करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जहां सरकार नियंत्रणकर्ता से अधिक सहयोगी की भूमिका निभाए. डिजिटल गवर्नेंस, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, ऑनलाइन सेवाएं और पारदर्शी प्रक्रियाएं इसी मॉडल की आधारशिला हैं. यदि यह सोच ईमानदारी से जमीन पर उतरी, तो प्रशासनिक भ्रष्टाचार और लालफीताशाही में बड़ी कमी आ सकती है.
हालांकि, विकसित भारत का सपना केवल सरकारी बैठकों और प्रस्तुतियों से पूरा नहीं होगा. इसके लिए राज्यों, निजी क्षेत्र, शिक्षा संस्थानों और समाज की समान भागीदारी जरूरी होगी. भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है तो रोजगार, कौशल विकास, तकनीकी नवाचार, कृषि सुधार, ऊर्जा सुरक्षा और न्यायिक दक्षता जैसे क्षेत्रों में ठोस परिणाम देने होंगे. केवल आर्थिक वृद्धि दर पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि सामाजिक समानता और संस्थागत मजबूती भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी. विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा प्रधानमंत्री की पांच देशों की यात्रा और मिडिल ईस्ट संकट पर दी गई जानकारी यह भी बताती है कि विकसित भारत का विजन अब घरेलू सीमाओं तक सीमित नहीं है. वैश्विक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत को अपनी अर्थव्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित रखना होगा. आने वाले वर्षों में भारत की वैश्विक भूमिका और जिम्मेदारियां दोनों बढऩे वाली हैं.
स्पष्ट है कि सरकार अब ‘विजन मोड’ में प्रवेश कर चुकी है. चुनौती यही है कि यह विजन कागजों से निकलकर गांव, शहर और आम नागरिक के जीवन में कितना बदलाव ला पाता है. क्योंकि विकसित भारत का वास्तविक अर्थ केवल बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि बेहतर जीवन, सक्षम व्यवस्था और आत्मविश्वासी नागरिक भी है.
