संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर भारत ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान उस सच्चाई की ओर खींचा है, जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जाता रहा है. भारत का आरोप है कि सुरक्षा परिषद सुधारों पर हुई हालिया बातचीत के दस्तावेज में सदस्य देशों की वास्तविक राय को दबाया गया और स्थायी व अस्थायी सदस्यता विस्तार के व्यापक समर्थन को कमजोर रूप में प्रस्तुत किया गया. यह केवल प्रक्रियागत विवाद नहीं, बल्कि उस वैश्विक संस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है, जो स्वयं को अंतरराष्ट्रीय शांति और संतुलन का सबसे बड़ा मंच बताती है. मौजूदा दौर में संयुक्त राष्ट्र जिस स्वरूप में कार्य कर रहा है, वह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों का प्रतिबिंब है, न कि 21वीं सदी की बदलती वैश्विक वास्तविकताओं का. सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य, अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस, आज भी वीटो शक्ति के आधार पर पूरी दुनिया की सामूहिक इच्छा को प्रभावित करते हैं. यह संरचना उस समय बनी थी जब एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अधिकांश देश या तो उपनिवेश थे या वैश्विक निर्णय प्रक्रिया से बाहर थे. लेकिन आज दुनिया बदल चुकी है, शक्ति संतुलन बदल चुका है और वैश्विक चुनौतियां भी पहले से कहीं अधिक जटिल हो गई हैं. यूक्रेन युद्ध, गाजा संघर्ष, सूडान की हिंसा, म्यांमार संकट और अफ्रीका के अनेक गृहयुद्ध इस बात के प्रमाण हैं कि संयुक्त राष्ट्र संघर्ष रोकने और स्थायी समाधान निकालने में लगातार विफल रहा है. कई मामलों में सुरक्षा परिषद केवल महाशक्तियों के राजनीतिक हितों का अखाड़ा बनकर रह गई है. जहां एक स्थायी सदस्य के हित प्रभावित होते हैं, वहां वीटो का उपयोग कर पूरी प्रक्रिया रोक दी जाती है. परिणाम यह होता है कि लाखों लोगों की पीड़ा के बावजूद वैश्विक समुदाय केवल बयान जारी करता रह जाता है.
भारत लंबे समय से यह कहता आया है कि यदि संयुक्त राष्ट्र को प्रभावी और विश्वसनीय बनाना है तो सुरक्षा परिषद का लोकतांत्रिक पुनर्गठन अनिवार्य है. दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला लोकतांत्रिक देश, तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था, शांति अभियानों में सबसे बड़ा योगदानकर्ता और वैश्विक दक्षिण की मजबूत आवाज होने के बावजूद भारत आज भी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता से बाहर है. यही स्थिति जापान, जर्मनी, ब्राजील और अफ्रीका के कई देशों की भी है. इससे यह संदेश जाता है कि संयुक्त राष्ट्र की संरचना अभी भी पुरानी शक्ति राजनीति की कैद में है.
भारत द्वारा उठाया गया मुद्दा केवल अपनी सदस्यता का नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और पारदर्शिता का है. यदि अधिकांश सदस्य देश सुधार चाहते हैं, तो उनकी राय को दस्तावेजों और निर्णय प्रक्रिया में स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित होना चाहिए. बहुमत की इच्छा को तकनीकी शब्दों और कूटनीतिक भाषा में कमजोर करना सुधार प्रक्रिया को धीमा करने का प्रयास माना जाएगा.
अब समय आ गया है कि संयुक्त राष्ट्र स्वयं को बदले. यदि यह संस्था नई वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप खुद को ढालने में विफल रहती है, तो इसकी प्रासंगिकता लगातार कम होती जाएगी. दुनिया को ऐसी सुरक्षा परिषद चाहिए जो कुछ देशों के हितों की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की आवाज बने.
