सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और रेबीज के खतरे को लेकर जो टिप्पणी की है, वह केवल एक न्यायिक फैसला नहीं, बल्कि रा’यों की प्रशासनिक विफलता पर कठोर टिप्पणी भी है. अदालत ने साफ कहा है कि संविधान के अनु‘छेद 21 के तहत नागरिकों को भयमुक्त और सम्मानजनक जीवन का अधिकार है. यदि कोई ब‘चा, बुजुर्ग या आम नागरिक सडक़ पर निकलते समय कुत्तों के हमले के डर में जीने को मजबूर हो, तो यह रा’य व्यवस्था की असफलता मानी जाएगी.
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में देश के अनेक शहरों और कस्बों में आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. कई रा’यों में छोटे ब‘चों की मौत तक हो चुकी है. स्कूल जाते ब‘चों, मॉर्निंग वॉक पर निकले बुजुर्गों और सडक़ पर काम करने वाले लोगों के लिए सार्वजनिक स्थान असुरक्षित होते जा रहे हैं. इसके बावजूद प्रशासन और स्थानीय निकाय अक्सर केवल कागजी योजनाओं तक सीमित दिखाई देते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इसी लापरवाही पर गंभीर चिंता जताई है.
अदालत का यह कहना महत्वपूर्ण है कि रेबीजग्रस्त, हिंसक और खतरनाक आवारा कुत्तों को वैधानिक प्रक्रिया के तहत यूथनेसिया यानी इ‘छामृत्यु दी जा सकती है. यह फैसला पशु क्रूरता को बढ़ावा देने वाला नहीं, बल्कि मानव जीवन की रक्षा को प्राथमिकता देने वाला है. अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए पशु जन्म नियंत्रण केंद्र स्थापित करने, रेबीज रोधी टीकों और इम्युनोग्लोबुलिन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने, तथा भारतीय पशु कल्याण बोर्ड के नियमों को लागू करने के निर्देश भी दिए हैं.
वास्तविक समस्या यह है कि देश के अधिकांश नगर निगम और पंचायतें पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम को गंभीरता से लागू ही नहीं कर पाईं. नसबंदी अभियान सीमित हैं, रेबीज टीकाकरण अधूरा है और कचरा प्रबंधन की खराब व्यवस्था आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रही है. शहरों में खुले कचरे के ढेर कुत्तों के लिए भोजन का स्थायी स्रोत बन गए हैं. ऐसे में केवल भावनात्मक बहस या सोशल मीडिया अभियान समस्या का समाधान नहीं कर सकते.
सुप्रीम कोर्ट ने डॉग लवर्स और एनजीओ की उन याचिकाओं को भी खारिज किया है जिनमें नवंबर 2025 के निर्देशों को वापस लेने की मांग की गई थी. अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि पशु अधिकारों की रक्षा जरूरी है, लेकिन मानव जीवन और सार्वजनिक सुरक्षा उससे ऊपर है. यह दृष्टिकोण व्यावहारिक और संवैधानिक दोनों है.
अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी रा’य सरकारों और स्थानीय निकायों की है. यदि अदालत के निर्देश भी जमीन पर नहीं उतरते, तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है. हर जिले में एबीसी केंद्र, पर्याप्त टीकाकरण, खतरनाक कुत्तों की पहचान और त्वरित कार्रवाई जैसी व्यवस्थाएं तत्काल लागू करनी होंगी.
आखिरकार, सभ्य समाज की पहचान केवल पशुओं के प्रति संवेदनशीलता से नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि वहां ब‘चे और बुजुर्ग बिना भय के सडक़ पर चल सकें. सुप्रीम कोर्ट ने इसी मूल प्रश्न को केंद्र में रखा है.
