नई दिल्ली | 12 जनवरी, 2026: मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यूरासियनटाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब एक अनौपचारिक सैन्य गठबंधन बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जिसे विशेषज्ञ “इस्लामिक नाटो” कह रहे हैं। इस गठबंधन की नींव सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए ‘स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट’ से पड़ी थी। नाटो के आर्टिकल-5 की तर्ज पर बने इस समझौते के तहत, किसी भी एक सदस्य देश पर हमला होने की स्थिति में उसे सभी साझेदार देशों पर हमला माना जाएगा। यह गठबंधन सऊदी की दौलत, पाकिस्तान की परमाणु शक्ति और तुर्की के आधुनिक सैन्य उद्योग को एक मंच पर ला रहा है।
इस उभरते हुए त्रिगुट के जवाब में भारत ने इजरायल के साथ अपनी रक्षा साझेदारी को नए शिखर पर पहुँचा दिया है। भारत अब इजरायल को केवल एक हथियार आपूर्तिकर्ता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है। हाल ही में भारत ने इजरायल के साथ 8.7 अरब डॉलर के रक्षा सौदे को मंजूरी दी है, जिसमें उन्नत SPICE मिसाइलें, ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर तकनीक शामिल हैं। दोनों देश अब मिसाइल डिफेंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और लेजर हथियारों जैसे भविष्य के युद्ध कौशल पर मिलकर काम कर रहे हैं, जो किसी भी संभावित क्षेत्रीय खतरे से निपटने के लिए भारत की तकनीकी श्रेष्ठता सुनिश्चित करेगा।
संभावित खतरों को देखते हुए भारत ने ‘चेकमेट’ कूटनीति अपनाई है। एक ओर जहाँ पाकिस्तान और तुर्की का गठबंधन मजबूत हो रहा है, वहीं भारत ने ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया जैसे देशों के साथ अपने रक्षा संबंधों को प्रगाढ़ किया है। इसके अलावा, I2U2 जैसे मंचों के जरिए अमेरिका और यूएई के साथ मिलकर भारत आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह ‘संतुलन बनाने की नीति’ न केवल सीमा सुरक्षा को पुख्ता करेगी, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव को भी सुरक्षित रखेगी।

