ओपी श्रीवास्तव
इंदौर:भागीरथपुरा में दूषित जल आपूर्ति ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि शहर के विकास मॉडल में चमक दमक भले ही दिखे, पर व्यवस्था की तकनीकी नींव कितनी कमजोर है! जिस शहर को स्वच्छता में देश का सर्वोच्च दर्जा मिलता रहा, वहीं के नागरिक जब प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हों, तो यह केवल प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था की सोच पर भी गंभीर प्रश्न है.
दुर्भाग्य यह है कि इस पूरे प्रकरण को भी वही पुराना रास्ता मिला-जनप्रतिनिधि और प्रशासन एक-दूसरे पर दोष मढ़ते रहे, और जनता की परेशानी राजनीतिक बयानबाजी की भेंट चढ़ गई. सोशल मीडिया ने भी उसी दिशा में बहाव पकड़ा- किसने क्या कहा, किसने किसे घेरा—लेकिन मूल प्रश्न यह है कि असली गुनाहगार कौन है?
तकनीकी जिम्मेदारी सबसे बड़ी, लेकिन सबसे कम जांच
मध्यप्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1961 तथा नगर निगम अधिनियम, 1956 के अनुसार किसी भी सार्वजनिक निर्माण कार्य में डीपीआर सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है. पाइपलाइन बिछाने से लेकर मार्ग निर्धारण, प्रदूषण की संभावना, सुरक्षा, निरीक्षण- इन सबकी प्राथमिक जिम्मेदारी इंजीनियरिंग तंत्र की होती है.
इसके बाद तकनीकी स्वीकृति, फिर प्रशासकीय स्वीकृति दी जाती है. कार्य ठेकेदार करता है, लेकिन इंजीनियरिंग विभाग की देखरेख में. कार्य पूर्ण होने पर एमबी (मेजरमेंट बुक) और निरीक्षण रिपोर्ट तैयार होती है- यही असली सच्चाई बताते हैं.
ऐसे में सवाल यह है कि- पाइपलाइन जिस क्षेत्र से गुजरी, वहां जोखिम का आकलन हुआ या नहीं?
डीपीआर में संभावित खतरों का उल्लेख किया था या उसे केवल औपचारिकता बना दिया गया?
निरीक्षण वास्तव में हुआ या सिर्फ कागजों में दर्ज हुआ?
यदि ये बिंदु स्पष्ट नहीं होते, तो चाहे जितने बयान दिए जाएँ, समस्या की जड़ उजागर नहीं होगी.
न्यायालय तक मामला पहुंचा, पर जांच अभी भी सतही
मामला माननीय उच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है, मुख्य सचिव तक नोटिस जारी हो चुका है. यह कदम निश्चित ही गंभीरता का सूचक है, परंतु अदालत तक पहुंचना समाधान का अंत नहीं, बल्कि एक शुरुआत है. न्यायपालिका तभी प्रभावी निर्णय दे सकेगी, जब जांच तथ्य-आधारित हो, न कि ‘औपचारिक’. इसलिए आवश्यक है कि बहस इस पर नहीं हो कि किसने आदेश दिया, किसने बयान दिया- बल्कि इस पर हो कि किसने अपनी तकनीकी जिम्मेदारी निभाने में चूक की.
राजनीति नहीं, व्यवस्था सुधार की दिशा में कदम
इस घटना ने यह भी स्पष्ट किया है कि जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी तकनीकी विशेषज्ञ नहीं होते. उनकी भूमिका नीति, स्वीकृति और संसाधन उपलब्ध कराने तक सीमित है. यदि इंजीनियरिंग तंत्र अपनी भूमिका ईमानदारी और दक्षता से नहीं निभाता, तो ऐसी घटनाएं बार–बार होंगी.
इसलिए अब समय है कि-
इंजीनियरिंग जिम्मेदारी तय हो
डीपीआर की पारदर्शी जांच हो
एमबी और निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक तथ्य बने
जवाबदेही व्यक्तिगत स्तर तक तय की जाए
भागीरथपुरा का प्रकरण केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है- शहर विकास का मॉडल कागजों पर नहीं, जमीन पर सुरक्षित हो. स्वच्छता पुरस्कारों से ज्यादा जरूरी है नागरिकों का सुरक्षित जीवन, और इसके लिए तकनीकी जवाबदेही सुनिश्चित करना ही पहला कदम है.
