ईरान : वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहराते प्रभाव

ईरान एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. आर्थिक संकट, गिरती रियाल की कीमतें और बेरोजगारी ने जनाक्रोश को भडक़ा दिया है, जो अब राजनीतिक असंतोष में बदल चुका है. अयातुल्लाह अली खमेनेई के नेतृत्व वाली इस्लामी व्यवस्था के सामने खड़ी यह चुनौती सतही नहीं, बल्कि दशकों की उपेक्षित आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है. तेहरान, मशहद और इस्फहान जैसे शहरों में प्रदर्शनकारियों का उग्र होना, सुरक्षा बलों से झड़पें, इंटरनेट प्रतिबंध और वैचारिक टकराव,ये संकेत देते हैं कि देश एक संवेदनशील मोड़ पर है. सवाल उठता है कि क्या यह संकट ईरान तक सीमित रहेगा ? निश्चित रूप से नहीं, ईरान वैश्विक तेल अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ है. ओपेक सदस्य के रूप में इसका उत्पादन प्रतिदिन 3.2 मिलियन बैरल से अधिक है. खाड़ी की अस्थिरता तेल आपूर्ति पर सीधा असर डालती है. यूक्रेन युद्ध और लाल सागर संकट से अभी बाजार उबर ही रहा है. यदि ईरान में अशांति लंबी चली, तो उत्पादन प्रभावित होगा, निर्यात बाधित होगा और ओपेक में तनाव बढ़ेगा. नतीजा होगा कच्चे तेल की कीमतों में उछाल !

दरअसल, ब्रेंट क्रूड हाल ही में 80 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुका है. जाहिर है यह वृद्धि महंगाई को भडक़ा सकती है. वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से ही धीमी विकास दर, उच्च मुद्रास्फीति और आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं से जूझ रही है. ईरान संकट परिवहन लागतें बढ़ाएगा, व्यापारिक अनिश्चितता पैदा करेगा और निवेशक विश्वास को कमजोर करेगा. यूरोप ऊर्जा संकट से त्रस्त है, जबकि एशिया के उभरते बाजार भी प्रभावित होंगे. आईएमएफ के अनुसार, वैश्विक विकास दर 2026 में 3.2 फीसदी रहने का अनुमान है. तेल मूल्य वृद्धि इसे और नीचे धकेल सकती है.

भू-राजनीतिक रूप से ईरान मध्य पूर्व का केंद्रीय खिलाड़ी है. इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में इसकी भूमिका निर्णायक है. शासन की कमजोरी से शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है, इजरायल-ईरान तनाव भडक़ सकता है और अमेरिका-रूस प्रतिस्पर्धा तेज हो सकती है. क्षेत्रीय संघर्ष का खतरा मंडरा रहा है, जो पूरे पश्चिम एशिया को अशांत कर सकता है.

भारत के लिए यह केवल कूटनीतिक चिंता नहीं, आर्थिक-रणनीतिक चुनौती है. हम 85 फीसदी तेल आयात करते हैं, जिसमें ईरान का योगदान महत्वपूर्ण रहा है. कीमत वृद्धि से महंगाई बढ़ेगी, राजकोषीय घाटा गहराएगा और शिपिंग-बीमा लागतें चढ़ेंगी. ईरान की अस्थिरता से क्षेत्रीय कनेक्टिविटी प्रभावित होगी. खाड़ी में 90 लाख प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा भी जोखिम में है. ईरान का यह आंदोलन दरअसल आर्थिक असंतोष का विस्फोट है, जिसे दमन से दबाना कठिन होगा. जाहिर है भारत को ईरान के आंतरिक संघर्ष के मद्देनजर संयमित कूटनीति अपनानी चाहिए. भारत को चाहिए कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करे, रूस-खाड़ी स्रोतों पर विविधीकरण करे और शांति प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाए. दरअसल, वैश्विक स्थिरता ही हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए.बहरहाल, ईरान का यह आंदोलन केवल सामाजिक-आर्थिक असंतोष का विस्फोट नहीं, बल्कि उस गहरी बेचैनी का संकेत है, जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया गया.यदि वहां की मौजूदा सत्ता ने संवाद की बजाय दमन का रास्ता अपनाया, तो यह संकट न केवल ईरान, बल्कि ऊर्जा बाजार, वैश्विक अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता,तीनों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है.

 

 

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