पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग के बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ईरान के समकक्ष से की आपात वार्ता, तेल संकट और वैश्विक सुरक्षा को लेकर भारत ने तेज की कूटनीतिक पहल

नई दिल्ली | मध्य-पूर्व (मिडिल-ईस्ट) में गहराते युद्ध के संकट के बीच भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मंगलवार को ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराकची से टेलीफोन पर विस्तृत बातचीत की। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के बाद क्षेत्र में उपजे तनावपूर्ण घटनाक्रमों पर दोनों नेताओं ने विचारों का आदान-प्रदान किया। ईरान के नए सुप्रीम लीडर के रूप में मुजतबा खामेनेई की नियुक्ति के बाद यह पहली आधिकारिक बातचीत थी। जयशंकर ने सोशल मीडिया पर जानकारी देते हुए बताया कि भारत और ईरान इस गंभीर संघर्ष के मद्देनजर निरंतर एक-दूसरे के संपर्क में रहने पर सहमत हुए हैं, ताकि क्षेत्रीय स्थिरता के प्रयास किए जा सकें।

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकाबंदी ने दुनिया भर में कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) की आपूर्ति को बाधित कर दिया है, जिससे भारत सहित वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। चूंकि दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस इसी मार्ग से गुजरता है, जयशंकर ने दक्षिण कोरिया और जर्मनी के विदेश मंत्रियों से भी इस मुद्दे पर चर्चा की। दक्षिण कोरियाई विदेश मंत्री चो ह्युन के साथ बातचीत में विशेष रूप से ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर जोर दे रहा है।

विदेश मंत्री जयशंकर ने स्पष्ट किया कि युद्ध की बदलती परिस्थितियों के बीच प्रभावित क्षेत्रों में फंसे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। जर्मनी और दक्षिण कोरिया के साथ हुई चर्चाओं में भी इस बात पर सहमति बनी कि हालात बिगड़ने पर नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए करीबी तालमेल बनाए रखा जाएगा। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्यांग की आगामी भारत यात्रा से पहले इन वार्ताओं को सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत इस समय न केवल अपनी घरेलू जरूरतों को सुरक्षित करने में जुटा है, बल्कि विश्व स्तर पर शांति और निर्बाध व्यापारिक मार्ग की बहाली के लिए भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

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